(4) व्यवहार में सामाजिक (धार्मिक) तथा व्यवसाय में स्वावलम्बी प्रमाणित होने के रूप में, मानवीय संस्कार सार्थक होता है।
फलस्वरूप संबंधों की पहचान, मूल्यों का निर्वाह सहजता से संपन्न होता है। साथ ही मानवीय संस्कृति और सभ्यता स्वाभाविक रूप में सम्पन्न होती है। इसका आधार है अखंड समाज में भागीदारी, सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी। इस प्रकार मानवीय शिक्षा -संस्कार पूर्वक पीढ़ी दर पीढ़ी सुरक्षित होना सहज है।
ज्ञानेन्द्रिय कर्मेन्द्रिय क्रियाएँ (45 से 64)
45. मृदु-कठोर 46. वहन-संवहन
छः प्रकार की रूचियाँ जीभ के संयोग में आयी वस्तु ( तरल, विरल, ठोस ) के परिणाम स्वरूप ही पहचानना होता है। हर जागृत मानव संवेदनाओं के प्रयोजनों को स्वस्थ शरीर के प्रयोजनों के लिए पहचाने रहना स्वाभाविक रहता है।
47. शीत/उष्ण | - | 48. पोषण |
49. खट्टा | - | 50. पोषण |
51. मीठा | - | 52. पोषण |
53. चरपरा | - | 54. पोषण |
55. कड़ुवा | - | 56. पोषण |
57. कसैला | - | 58. पोषण |
59. खारा | - | 60. पोषण |
61. सुगन्ध/दुर्गन्ध | - | 62. श्वसन/नि:श्वसन |
63. सुरूप/कुरूप | - | 64. स्वागत/अस्वागत |
वहन :- वांछापूर्वक उन्नयन। निर्वाह क्षमता ही वहन क्रिया है।
संवहन :- (1)पूर्णता के प्रति वेदना सहित गति वहन करना। (2) पूर्णता के अर्थ में विचार संपदा का वहन।
मृदु :- (1) स्पर्शेंद्रिये से कम भार व दबाव को सहने वाली वस्तुएं। संकुचन पूर्वक वहन करने वाली वस्तुएं।