मध्यस्थ दर्शन, मानव और अस्तित्व को वर्तमान में प्रमाणित करने की चिंतन धारा है। यहाँ चिंतन का तात्पर्य साक्षात्कार पूर्वक प्रयोजन के अर्थ में प्रक्रियाओं को स्पष्ट करने से है। इस क्रम में अस्तित्व और मानव ही, अध्ययन की वस्तु है। अस्तित्व, सत्ता (साम्य ऊर्जा) में सम्पृक्त प्रकृति के रूप में वर्तमान है। फलस्वरूप विकास क्रम में और रचना क्रम में मानव और प्रकृति सहज ही अध्ययनगम्य हुए हैं। जिसमें से मानव के अध्ययन में, जीवन और शरीर का स्पष्ट रूप, कार्य व्यवहार, व्यवस्था व प्रयोजन समझ में आता है। यह अध्ययनगम्य हुआ है। जिसमें से जीवन ही विद्या का केन्द्र बिंदु है। जिसमें विद्या का तात्पर्य समझदारी से है। जीवन ज्ञान जीवन जागृति पूर्वक परिपूर्ण होता है। जीवन जागृति जानने-मानने के क्रम में सहज रूप में प्रमाणित होती है। जीवन प्रकाश में ही अस्तित्व दर्शन सहज संभव है। जागृत जीवन प्रकाश ही न्याय, धर्म, सत्य दृष्टि के रूप में क्रियाशील रहता है। इस प्रकार सहअस्तित्व ही सम्पूर्ण विद्या का स्वरूप हुआ। अस्तित्व में मानव अविभाज्य है। हर मानव जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में वर्तमान है। मानव समग्र अस्तित्व को, जीवन को, शरीर को जानने- मानने, पहचानने- निर्वाह करने के रूप में अभिव्यक्त होने वाला है। ऐसी जानने- मानने, पहचानने की क्रिया जीवन में संपादित होती है। निर्वाह रूप में अभिव्यक्ति क्रिया मानव परम्परा में शरीर के द्वारा सम्पन्न होती है। इस प्रकार जीवन ही ज्ञाता होना सहज रूप में समझ में आता है। ज्ञेय (जानने योग्य) सम्पूर्ण अस्तित्व है। अस्तित्व कैसा है ? यह ज्ञान सत्ता में संपृक्त प्रकृति के रूप में सम्पूर्ण मानव को वर्तमान में समझ में आता है। इस प्रकार “अस्तित्व कैसा है ?” - का उत्तर सहज है। यह अस्तित्व सहअस्तित्व के रूप में ही है क्योंकि सत्ता में संपृक्त प्रकृति ही, अस्तित्व समग्र है। यह सहअस्तित्व का मूल रूप है। सत्ता में संपृक्त जड़-चैतन्य प्रकृति रूपी सहअस्तित्व ही परमाणु में विकास, विकास क्रम में गठन पूर्णता (चैतन्य इकाई, जीवन पद) जीवनी क्रम, जीवन जागृति क्रम, जीवन जागृति क्रिया पूर्णता व आचरण पूर्णता, रासायनिक- भौतिक रचना-विरचना निरंतर क्रिया है। इस प्रकार जीवन और ज्ञान का सम्पूर्ण स्वरूप समझ में आता है। अस्तु, जीवन ही ज्ञाता है, सहअस्तित्व ही ज्ञेय है। सहअस्तित्व में अनुभूत होना ही ज्ञान है। अतः जीवन = ज्ञाता = दृष्टा, सहअस्तित्व = दृश्य, सहअस्तित्व में अनुभव = ज्ञान = दर्शन।

जागृत जीवन दृष्टि ही दर्शन का सूत्र है। जीवन में दृष्टियाँ प्रिय, हित, लाभ, न्याय-धर्म-सत्य को परिशीलन करने के क्रम में कार्यरत हैं। जिसमें से प्रिय-हित लाभ दृष्टियाँ इन्द्रिय सन्निकर्ष होने के आधार पर भ्रमात्मक होना अथवा भ्रमपूर्वक ही प्रिय-हित-लाभ को सुख का आधार मानना मूल्यांकित हो चुका है। अतएव जीवन जागृति पूर्वक, न्याय-धर्म-सत्य पूर्ण दृष्टियों से स्वयं को

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