इसके बाद गणतांत्रिक तरीके से जनादेश जैसी अद्भुत शक्ति के साथ गद्दी में बैठने की प्रथा आरंभ हुई। पहले से ही सत्ता का स्वरुप छोटे-बड़े सभी देशों के साथ यह बना हुआ है। इन जन प्रतिनिधियों के आदेशों को पालन करने के लिए संविधान सहज अनुमति बनी रहती हैं। जहाँ-जहाँ गणतांत्रिक प्रणाली प्रभावशील हुई है, वहाँ-वहाँ लिखित संविधान का होना पाया गया है। गणतांत्रिक शासन विधान में जनमानस का ख्याल रखा जाता है। ऐसे प्रचारों का खास तौर पर ख्याल रखते हुए इसे प्रचारित किया जाता है।
मुद्रा :- गणतांत्रिकता के लिए सांस्कृतिक आधार, आर्थिक आधार, राजनैतिक आधार मुद्रा को माना गया है। राजनैतिक लक्ष्य सत्ता हस्तांतरित करना है। सांस्कृतिक आधार की पहचान पहनावा (कैसा कपड़ा पहनते है) श्रृंगार, नृत्य, शादी ब्याह के तरीके को माना गया। इसकी विविधताओं को वैध मान लिया गया है। जैसे, सर्वाधिक आय, कम आय अथवा सर्वाधिक संग्रह (पूंजी) पैसा, कम से कम पूंजी पैसा। पूंजी का स्वरुप मुद्रा है। मुद्रा का मूल रूप एक कागज है । कागज का मूल रूप बाँस लकड़ी ही हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ है कि बाँस लकड़ी के ऊपर मानव कुछ लिखता है, उसका नाम मुद्रा है। मुझे लिखने वाले का दिल दरिया जैसा दिखता है। किसी कागज के टुकड़े पर सौ, किसी पर एक, किसी पर लाख, करोड़ लिखा हुआ देखने को मिलता है। मानव के आवश्यकीय वस्तु के रूप में वह मुद्रा दिखती नहीं है। यह मान लिया जाता है मुद्रा से वस्तु मिलेगी।
इस मान्यता में यह स्पष्ट हुआ है कि वस्तु का प्रतीक मुद्रा है। स्मरणीय सूत्र यह है कि “प्रतीक प्राप्ति नहीं होती और प्राप्तियाँ प्रतीक नहीं होती।” इसका तात्पर्य यही हुआ कि हर प्रतीक कैसा भी, कितना भी बदल सकता है। जैसा पहले भी कह चुके है कि कागज के टुकड़े पर “एक” भी लिखा जा सकता है और उस पर एक अरब भी। इसका ध्रुवीकरण करने के लिए प्रत्येक देश ने विदेशों के साथ एक आवश्यकता को अनुभव किया। उसे किसी प्रकार की धातु वस्तु (जैसा सोना) मान ली गई है। इस विधि में जिनके पास ज्यादा वस्तु है, वह वस्तु (अर्थात् सोना) पत्र मुद्रा को ध्रुवीकृत करता है, अधिक वस्तु (सोना, चांदी) के आधार पर तैयार की गई पत्र मुद्रा की संख्या कम दिखती है वह अधिक मूल्यवान दिखता है। वहीं जिस देश में वस्तु (सोना, चांदी) कम हो गई है अथवा जहाँ सोना जैसी वस्तुएँ कम होती जाएगी, ऐसी मुद्रा कोष से प्रस्तावित पत्र मुद्रा की संख्या बढ़ते ही आया और बढ़ता ही रहेगा।
इस प्रकार जिस देश में मुद्रा कोष की आधार वस्तु (सोना) जैसे-जैसे घटती गई, उसी अनुपात में दूसरे देश का आधार मुद्रा कोष की आधार वस्तु बढ़ गई है। उतने अनुपात में घाटा कोष वाले देशों से वह वस्तुओं को खरीदता है। उसी अनुपात और अवधि से अधिक कोष वाले देश बेचते हैं। इस प्रकार मुद्रा कोष अर्थात् प्रतीक मुद्रा के आधार पर जिन वस्तुओं को कोष मान लिया गया है वह जिनके पास अधिक