में समाहित अंशों की संख्या हैं। तात्विक परिणाम यही है। इन परमाणुओं में जो अंशों की संख्याएँ होती है, उसी के आधार पर उसकी परंपरा व मात्रा स्थापित होती है । इसकी पोषण विधि सहअस्तित्व के आधार पर स्पष्ट हुई हैं। इसकी पोषण विधि यथा-दो अंशों से गठित परमाणु होने की बात, दो अंश वाले परमाणु प्रजाति और समृद्घ होने की संतुष्टि स्पष्ट होती है और दो अंशों के परमाणु के होने की संभावना बनी रहती हैं।
ब्रह्माण्डीय क्रियाकलापों के क्रम में उष्मा, किरण, विकिरण को पचाने के क्रम में कई बार कई परमाणुओं में से कुछ अंश बहिर्गत हो जाते है। यह अपने में परमाणु के रूप में गठित हो जाते है अथवा किसी परमाणु में समाविष्ट हो जाते हैं। गठित होने का संभावना सदा बना रहता है। इसलिए दो अंशों का परमाणु गठन का संभावना रहता ही हैं। अस्तित्व में सभी अवस्थाओं में उन-उनकी परंपरा अक्षुण्ण रहती ही हैं। पदार्थावस्था से न्यूनतम अवस्था में कोई धरती होती नहीं है। पदार्थावस्था सहज धरती में ही चारों अवस्थाएँ प्रमाणित हो जाती हैं। हर अवस्था में परंपराएँ अपने अपने सिद्घांत से व्यवस्थित है ही। मानव को ही अभी तक अपनी मौलिक परंपरा को पहचानना शेष है।
पदार्थावस्था में समृद्घ धरती ही प्राणावस्था में उदात्तीकृत होती हैं। फलस्वरुप धरती पर हरियाली आरंभ होती हैं। क्रम से धरती समृद्घ होती हैं। पदार्थावस्था, प्राणावस्था के बीच रासायनिक प्रक्रियाएँ अपने-आप वैभवित रहती हैं। इस वैभव का मूल बिन्दु पदार्थावस्था अपने में समृद्घ होने की अभिव्यक्ति है।
अस्तित्व सहज संपूर्ण अभिव्यक्ति का स्वरुप सत्ता में संपृक्त पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था और ज्ञानावस्था ही हैं। यह इसी गवाही के आधार पर है, इसी प्रमाण के आधार पर है कि धरती पर चारों अवस्थाएँ स्वयंस्फूर्त प्रमाणित हो चुकी हैं। इसी आधार पर यह स्पष्ट है कि प्रत्येक धरती में ये अवस्थाएँ प्रमाणित होने के क्रम में विकास नित्य प्रभावी है। इसमें बनाने का, बनने का, बनाने वाले का कोई संयोग दिखाई नहीं पड़ता। क्योंकि सहअस्तित्व विधि से अस्तित्व स्वयं स्फूर्त है। सत्ता में संपूर्ण प्रकृति का संपृक्त रहना ही अस्तित्व सहज अभिव्यक्ति का क्रम, प्रक्रिया, परिणाम, स्थिति और गति हैं। इन तथ्यों से बनाने-बिगाड़ने जैसी कोई वस्तु हो, ऐसा कुछ नहीं है।
सहअस्तित्व ही स्वयं व्यक्त सहज वस्तु है। इसी क्रम में प्रकृति में विकास व जागृति नित्य संभावना के रूप में समीचीन रहता है। यह इस प्रकार से दिखता है कि पदार्थावस्था जब समृद्घ होती है, तब प्राणावस्था में उदात्तीकृत होना एक कार्य, एक घटना, एक वैभव दिखाई पड़ता हैं। जब प्राणावस्था अपने में समृद्घ हो जाता है, वैसे ही जीवावस्था का उपक्रम, स्वेदज विधि से आरंभ होता है। स्वेदज संसार में पाए जाने वाले कुछ वस्तुओं अथवा जीवों में यह प्रक्रिया देखी गई है कि वह अंडज परंपरा के रूप में परिवर्तित हो