अर्थात् बीसवीं शताब्दी के अंत में दूरश्रवण, दूरगमन, दूरदर्शन संबंधी और भारवाहक संबंधी सभी यंत्रों को मानव परंपरा ने प्राप्त कर लिया। ये सब उपलब्धियाँ मानव को अच्छी भी लग रही हैं। मानव में इसे बनाये रखने की इच्छा और संकल्प भी समझ में आता है। मानव ने ही इन सब यंत्रों का निर्माण किया है।
उल्लेखनीय बात यह है कि ऐसे यंत्रों की उपलब्धि के उपरान्त यह निष्कर्ष निकाल लिया गया है कि यंत्र का नियंत्रण सुलभ है, मानव को नियंत्रित करना सुलभ नहीं है। इस बात को तब मान लिया जब यंत्र तैयार हो चुका। इसमें पहली बात ध्यान में लाने की है कि ऐसे व्यापारियों ने, ऐसे निर्णय को स्वीकारा जो अपने को सर्वोत्कृष्ट व्यवस्थापक अथवा विकसित हो गये, ऐसा मानते रहे। ऐसे व्यवस्थापक अधिकांश उत्पादन में लगे हुए व्यक्तियों को उत्पादन के लिए मार्गदर्शन, निर्देशन पूर्वक नियंत्रित करते आए। उनका प्रधान मुद्दा या इस प्रकार निर्णय लेने का आधार बिन्दु यह बना कि मनचाहे उत्पादन और मनमाने लाभ के प्रति प्रतिबद्घतावश कार्यकर्ता और व्यवस्थापक के बीच बंटवारे के मुद्दे पर फँसी हुई स्थिति रही है। यह स्थल आज भी उलझा हुआ है। इसका मूल कारण भय और प्रलोभन ही है।
आज तक भय और प्रलोभन के आधार पर ही उत्पादन व्यवस्था को बनाए रखने का प्रयास सतत् रहा। शनै:-शनै: प्रलोभन, सुविधा, संग्रह से संघर्ष भड़कने के अनंतर संघर्ष, दूसरों से भयभीत होने की स्वीकृतियाँ घटती आई। इसके विपरीत दूसरों को भयभीत करने की प्रवृति व मानसिकता बढ़ी। तरीकों को बारंबार बदला गया। फलत: अच्छे व्यवस्थापक भय पैदा करने में अपनी असमर्थता स्वीकारते गए। उसी की प्रतिक्रिया में उद्योग, उत्पादन संयंत्रों को स्वचालित होना सुगम मान लिया गया। उसमें भी कुछ आदमियों की आवश्यकता पड़ी। इस स्थिति को इस प्रकार अनुकूल मान लिया गया है कि बहुत लोगों की जगह थोड़े लोगों के साथ व्यवस्था देना सुगम है।
कम और अधिक लोगों के साथ भी यह देखा गया कि प्रलोभन और धन के बंटवारे के मुद्दे पर ही व्यवस्थापक और कार्यकर्ताओं के बीच दूरी बनी रही। जहाँ ज्यादा लोग काम करते थे, वह स्वचालित होने के उपरान्त भी थोड़े लोगों के साथ भी, व्यवस्थापक और कार्यकर्ताओं के बीच बंटवारे का प्रसंग एक मुद्दे के रूप में बना ही रहता है। इसमें अधिकांश रूप में यही सुनने को मिल रहा है स्वचालित संयंत्रों में काम करने वाले यंत्र नियंत्रक के रूप में ही अधिकांश लोग हैं। स्वचालित संयंत्र विहीन स्थितियों में उतना ही पढ़ा लिखा व्यक्ति जो कुछ भी साधनों को प्राप्त करता है, उससे अधिक स्वयं को मिलने के आधार पर सांत्वना पाते हुए देखा जा रहा है। कुछ संयंत्रों में यह भी आरंभ हो चुका है कि बंटवारे में और परिवर्तन की आवश्यकता है। यह मूलत: प्रलोभन के तृप्ति बिंदु न होने से है। यही समस्या मूलत: व्यवस्थापक और कार्यकर्त्ताओं में परेशानी का मुद्दा है। मूल व्यवस्थापक संग्रह और भोग के लिए लाभोन्मादी मानसिकता को अपनाए रहते