हैं। कार्यकर्त्ता सदा ही, आज के बाद और ज्यादा प्रतिफल मिले, कम काम करना हो और जिम्मेदारियाँ कुछ न हो इसी का अनुसंधान करता ही रहता है, ऐसा देखने को मिलता है। यह स्थिति कमोवेश सभी देशों में ऐसी ही है। इससे यह पता चलता है कि लाभोन्मादी विधि में किए जाने वाले व्यवस्थापक और कार्यकर्त्ता दोनों के संतुष्ट होने को कोई बिंदु नहीं है।
आवश्यकता के आधार पर ही सभी उद्योग स्थापित हो पाते हैं। लाभोन्माद के आधार पर ही असंतुलन आरंभ होता है। असंतुलन, मानव की वांछा व उपलब्धि के बीच रिक्तता ही है। इसमें उल्लेखनीय तथ्य यही है कि भय और प्रलोभन के आधार किया गया समझौता ही तत्कालीन सांत्वना के रूप में होना देखा गया है। परंतु अन्तत: असफल होता है। यही व्यवस्था और कार्यकर्त्ता दोनों में देखने को मिलता है। एक क्षण सांत्वना रहती है तो बहुत क्षण असंतोष रहता है। यही स्वरुप आज का चित्रण है।
उत्पादन और संतुलन सहज वैभव का मूल सूत्र विकल्प के रूप में होना समझ में आता है कि:-
1. भय और प्रलोभन के स्थान पर मूल्यों की पहचान, निर्वाह और मूल्यांकन करने का दायित्व।
2. लाभोन्माद के स्थान पर विकल्प के रूप में आवर्तनशीलता की समझ और प्रक्रिया।
3. स्वयं व्यवस्था एवं समग्र व्यवस्था में भागीदारी।
5. श्रम मूल्यों का मूल्यांकन, स्वयं का, दूसरों का मूल्यांकन।
6. श्रम विनिमय।
7. हर मानव सहज रूप में अक्षय बल, अक्षय शक्ति संपन्न है। श्रम शक्ति ही निपुणता, कुशलता के रूप में मूल पू्ंजी है। यह पूंजी निवेश, पूंजीवाद और साम्यवाद का विकल्प है।
8. संग्रह के स्थान पर समृद्घि।
9. मानव व नैसर्गिक संबंध, हर परिवार मानव का उत्पादन में भागीदारी।
10. हर परिवार में व्यवहार व उद्योग, परिवार व्यवस्था में भागीदारी।
इन सबके मूल में, प्रत्येक व्यक्ति में जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान होना एक अनिवार्यता है। तभी हर मानव में, से, के लिए स्वयं में विश्वास, श्रेष्ठता का सम्मान, प्रतिभा और व्यक्तित्व में संतुलन, व्यवहार में सामाजिक, व्यवसाय में स्वावलंबी होना सहज होता है। मानव जब तक स्वयं में, से, के लिए विश्वास नहीं करेगा, तब तक एक व्यवस्थापक रहकर अथवा एक कार्यकर्ता रहकर अथवा और भी किसी स्थिति में रहकर संतुष्टि, संतुलन, नियंत्रण पाना संभव नहीं है। फलस्वरुप अव्यवस्था को पैदा करेगा ही करेगा। इसलिए जीवन प्रत्येक मानव में, समान रूप में विद्यमान होने के सत्य में जागृति आवश्यक है।
जीवन के क्रियाकलाप का पहला स्वरुप :-