जागृति को व्यक्त किया। यही क्रम आज भी है। वर्तमान परंपराओं से अधिक जागृति सहज अभिव्यक्ति और संप्रेषणा की प्रस्तुति स्वयं “समाधानात्मक भौतिकवाद” है। इससे यह पता चलता है कि, मानव परंपरा अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था के रूप में जब तक स्थापित नहीं हो जावेगा, तब तक समुदाय परंपरा से अधिक जागृत मानव होता ही रहेगा। इस गवाही से यह समझ में आता है कि जीवन सहज रूप में हर व्यक्ति जागृति के लिए प्रकारान्तर से प्रयास करते ही रहता है।
iv) तन, मन, धन रुपी अर्थ की सुरक्षा एवं सदुपयोग :- मनुष्य तन, मन, धन रुपी अर्थ का सदुपयोग करता ही है। यह क्रिया मानव में ही होना पाया जाता है। तन का स्वरुप सबको समझ में आ गया है - पाँचों ज्ञानेन्द्रियों और पाँचों कर्मेन्द्रियों के क्रियाकलाप। मन का स्वरुप - जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन, मानवीयता पूर्ण आचरण संपन्न मानसिकता से है। कम से कम जीवन ज्ञान संपन्न मानसिकता से है। जीवन ज्ञान संपन्नता से ही अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी होना संभव हुआ। जीवन ज्ञान संपन्नता ही निर्भ्रमता का द्योतक होना पाया गया। इसी आधार पर ऐसी ज्ञान संपन्न मानसिकता और स्वस्थ शरीर के संयोग से ही ये तथ्य प्रस्तुत होते हैं। इसी के साथ स्वधन का (श्रम नियोजन पूर्वक प्राप्त जो कुछ भी धन रहता है, उन सब का) सदुपयोग, सुरक्षा प्रत्येक मानव चाहता है। भ्रमित मानव भी सुरक्षा चाहता है, जबकि निर्भ्रम मानव चाहता भी है, करता भी है। ऐसे सदुपयोग को, सुरक्षा को देखा गया है, परखा गया है। इसे इस प्रकार पहचाना जा सकता है कि:-
जागृत मानव अपने तन, मन, धन रुपी अर्थ को आगे पीढ़ी, पीछे पीढ़ी के साथ वर्तमान दायित्व एवं कर्त्तव्य पूर्वक अर्पित, समर्पित कर सदुपयोग पूर्वक सुख को पा लेता है। फलस्वरुप उस-उस की सुरक्षा होना प्रमाणित होता है।
उपयोग :- स्वायत्त मानव सहज परिवार में तन, मन, धन रुपी अर्थ का उपयोग मूल्य और मूल्यांकन पूर्वक उभय तृप्ति।
सदुपयोग :- परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था में भागीदारी करते हुए तन, मन, धन रुपी अर्थ का नियोजन, सदुपयोग है।
प्रयोजनशीलता :- जागृतिपूर्ण विधि से प्रमाणित करने में नियोजित किया गया तन, मन, धन रुपी अर्थ।
सदुपयोग पूर्वक सुख उनको मिलता है जो अपने तन, मन, धन को विकास और जागृति, कर्तव्य और दायित्वों के लिए अर्पित करते है जिसके लिए अर्पित हुआ, उसकी सुरक्षा, जागृति और विकास के अर्थ में संपन्न हुई। यही पूरकता विधि है।