मानव परंपरा में पूरक विधि से ही, मानव सहज ऐश्वर्य तन, मन, धन रुपी अर्थ का सदुपयोग, सुरक्षा सहज सौन्दर्य, सुख और समाधान को देखना बनता है एवं यही मानव परंपरा में पाई जाने वाली मौलिकता है। इस क्रम में मानव सहज सुरक्षा, सदुपयोग- जो सुरक्षित करता है, जो सुरक्षित होता है, इन दोनों में ओतप्रोत उत्सव अर्थात् प्रसन्नता की समानता, समाधान की समानता और सौंदर्य बोध सहज ही होता है। यही मानव तथा मानव परंपरा, नियंत्रित होने का मूल बिंदु है। इसका सकारात्मक सौंदर्य प्रत्येक जागृत मानव या जागृत परिवार में देखा जा सकता है। जो मानवतीयता पूर्ण आचरण मे दृढ़ हो चुके हैं।
तन, मन, धन रुपी अर्थ के सदुपयोग, सुरक्षा क्रम में ही मानव व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी है और अखण्ड समाज रचना, रचना कार्य और उसमें भागीदारी का निर्वाह करता है, यही जागृत पंरपरा का दायित्व हैं।
मानवीयता सहज विधि से तन, मन, धन रुपी अर्थ का सदुपयोग - सुरक्षा क्रम में जनसंख्या नियंत्रण का मार्ग प्रशस्त होता है और पर्यावरण सुरक्षा भी सुलभ होता है। मानव जब तक असुरक्षा से पीड़ित रहेगा, तब तक प्रदूषण को पैदा करता ही रहेगा। पर्यावरणीय और नैसर्गिक समस्याओं को तैयार करेगा। अभी तक इन परिप्रेक्ष्यों में निर्मित संपूर्ण समस्याएँ मानव के प्रति मानव का भ्रम मुक्त मिलन संपन्न न होना रहा। इसकी गवाही कई रुपों में दिखाई पड़ती है। अंगरक्षक से सीमा सुरक्षा तक फैला हुआ जाल हर एक देश, हर एक सम्प्रदाय कहलाने वाले के पीछे सब दिखता है। यह सब इसी बात का द्योतक है कि मानव के साथ मानव ने अपने तन, मन, धन की सुरक्षा, सदुपयोग को पहचाना नहीं, निर्वाह किया नहीं और मूल्यांकन करना तो कोसों दूर रहा। इसका और भी परंपरागत साक्ष्य द्रोह-विद्रोह, शोषण और युद्घ का प्रसंग इतिहास में गुंथा हुआ वर्तमान में देखने को मिलता है। इन सब प्रतिकूलताओं के बावजूद सर्वशुभ कार्यक्रम, योजनाएँ, शास्त्र विधि, विचार विधि, प्रमाण, अनुभव दर्शन विधि अपने आप उद्गमित होकर मानव के सम्मुख प्रस्तुत हो गया है अथवा हो रहा है। यह “समाधानात्मक भौतिकवाद” भी प्रस्तुत है।
मानव परंपरा में बढ़ रहा भ्रम जो अपना-पराया के रूप में है, परेशान कर रहा है। जिससे मुक्त होने के लिए मानव को पहचानना ही होगा। अस्तित्व को पहचानना ही होगा। सहअस्तित्व को पहचानना ही होगा और जीवन को पहचानना ही होगा। यह तथ्य, सत्य, यथार्थ अनेक समुदाय परंपरा रुपी प्रवाह में ऐसी कोई चीज दिखाई नहीं पड़ती है, इसलिए इस साक्ष्य से संपूर्ण समुदायों द्वारा अपने भ्रम को स्वीकारना संभव हो जाएगा। फलस्वरुप निर्भ्रमता के लिए प्रयास सहज रूप में ही होगा। इस प्रकार सभी मानव शुभ चाहते हुए भी, शुभ से वंचित रहे, इसका कारण स्पष्ट हो जाता है और सर्वशुभ के लिए मार्ग सहअस्तित्व सहज प्रणाली से प्रशस्त हो जाता है। सहअस्तित्ववादी प्रणाली में ही संपूर्ण भौतिकता, रासायनिकता समाधान