माना जाता है, संग्रह और भोग। राज सत्ता और वस्तु को हथियाने के क्रम में ही संघर्ष का दौर चल रहा है। यह प्रधानत: अधिकारियों, राजनेताओं, कुछ एक धर्म नेताओं-व्यापारियों तथा उद्योगपतियों में देखने को मिल रहा है। आम जनता के लिए ये ही सब लोग सुविधा संग्रह का आदर्श हैं। इस आधार पर अधिकाधिक संख्या में मानव मानस संग्रह सुविधा और भोग यात्रा में व्यस्त है।
उल्लेखनीय बात यह है कि रुचि मूलक मानसिकता के आधार पर शासन, व्यवस्था, समाज और वर्तमान में विश्वास होना संभव नहीं हैं। व्यवस्था का विचार, अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन से सर्वसुलभ होता है। यह चिंतन अस्तित्व में अविभाज्य मानव सहज अध्ययन है। अस्तित्व समग्र का अध्ययन, मानव संपूर्णता का अध्ययन करने वाला मूल वस्तु मानव ही है। मानव अपने रूप, गुण, स्वभाव, धर्म के रूप में संपूर्ण होता है। इसका अध्ययन संभव हो गया है। मानव मूलत: शरीर और जीवन के संयुक्त रूप में है, यह प्रमाणित है, वर्तमान है। इसका विधिवत् अध्ययन किया गया। शरीर रचना के संबंध में, रासायनिक-भौतिक रचना रुपी शरीर के समुचित रूप को स्पष्ट कर दिया है और जीवन का स्वरुप “अस्तित्व में परमाणु में विकास” अध्याय में स्पष्ट किया गया है। परमाणु में विकास ही गठनपूर्णता पूर्वक चैतन्य प्रकृति ही जीवन पद में प्रतिष्ठित है - ऐसा पाया जाता है। ऐसा जीवन ही जागृति क्रम में मानव परंपरा में, मानव शरीर द्वारा प्रमाणित होता है। यह नियति सहज कार्य है। ऐसे कार्य की सफलता क्रम में, मानवीयता एवं मानवत्व एक स्पष्ट आयाम है - इस बात को स्पष्ट किया है। इस प्रकार अस्तित्व- सत्ता में संपृक्त प्रकृति है, यह स्पष्ट हो चुका है। अस्तित्व सहज चारों अवस्थायें सहअस्तित्व के रूप में, नित्य वर्तमान है - यह स्पष्ट किया जा चुका है।
इस प्रकार सहअस्तित्व सहज विधि से मानव व्यवस्था को पहचानने का मार्ग प्रशस्त होता है। इसका सूत्र यही है। प्रत्येक एक अपने “त्व” सहित व्यवस्था है और समग्र व्यवस्था में भागीदार हैं। इसलिए मानव भी मानवत्व सहित व्यवस्था है और उसकी समग्र व्यवस्था में भागीदारी सहज संभव हैं। इसीलिए व्यवस्था, मानवत्व सहज गति है, न कि शासन। व्यवस्था विधि से ही परस्परता में मूल्य और मूल्यांकन सार्थक होता है।
व्यवस्था अस्तित्व सहज वर्तमान में विश्वास है। अस्तित्व नित्य वर्तमान है। वर्तमान में विश्वास रहना, उसकी अक्षुण्णता की आवश्यकता रहना, यही मानव में जागृति का प्रमाण हैं। व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी ही गति है।
प्रत्येक मानव वर्तमान में विश्वस्त, भविष्य के प्रति आश्वस्त रहना ही चाहता है। इसमें अगर कोई बाधा निर्मित हुई है तो वह मानव के कारण ही है। यदि रहस्यता हुई है तो वह भी मानव सहज नैसर्गिकता है।