सर्वप्रथम मानव के साथ विश्वास बनाए रखने; विश्वास पाने और उसकी निरंतरता पर भरोसा कर सकें, यही मुख्य स्थली हैं। इस पर विचार करने, विवेचना करने, योजनाबद्घ तरीके से प्रमाणित होने के लिए मानव ही अध्ययन के मूल में प्रस्तुत होता है। अध्ययन की मूल वस्तु मानव ही है। अध्ययन करने वाला मानव ही है और प्रयोजित होते समय मानव और नैसर्गिकता का मूल्यांकन होना एक आवश्यकता बन जाती है।
मानव जब कभी भी अपने में समाधान से तृप्त होता है, तब-तब नैसर्गिकता में समाधान यथा मानव धरती, जल, वायु, जंगल, जीव, पक्षी के साथ समाधान आता है। इनके साथ कितना समाधान सहज कार्य किया, यही स्व-समाधान की पुष्टि है।
सहअस्तित्ववादी नजरिए से जब हम देखते हैं, तब हमें आंकलित होता है कि हम कितना समाधानित हैं। इस बात को अपने में मूल्यांकन करने योग्य होते हैं। समाधान मूलत: पूर्णता और पूर्णता की निरतंरता के अर्थ में प्राप्त अवधारणा के रूप में मानव में ही प्रमाणित होना पाया जाता है। पूर्णता का स्वरुप अस्तित्व में गठन पूर्णता, क्रिया पूर्णता, आचरण पूर्णता ही हैं, जिसका दृष्टा-ज्ञाता जागृत मानव है। दृष्टा का तात्पर्य अस्तित्व सहज नित्य वर्तमान में जानने, मानने, पहचानने, निर्वाह करने से है। इसकी अबाध गति, अक्षय स्रोत सहअस्तित्व है। मानव ही प्रमाणित हो पाता है। इसकी सत्यता सहज अभिव्यक्ति के लिए मानव में अप्राप्त की प्राप्ति, अज्ञात को ज्ञात करने और प्रमाणित होने की अभिप्सा देखने को मिलती है। अभीप्सा की सार्थकता अभ्युदय के पक्ष में कल्पना, विचार और इच्छा सहज क्रियाकलाप से है। अभीप्सा सर्वमानव में वर्तमान है ही। अभीप्सा में, इच्छा की पूर्णता के प्रति अवधारणा सहज रूप में परिवर्तित करना ही मानव सहज जागृत परंपरा का कार्यकलाप है। जागृति पूर्वक ही मानव का वर्तमान में विश्वास और उसकी अक्षुण्णता के प्रति आश्वस्त होना पाया जाता है।
अस्तित्व में अविभाज्य वर्तमान रुपी मानव सहअस्तित्व सहज विधि से ही जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान संपन्न होता है, इसका प्रावधान नित्य समीचीन है। इसी आधार पर कल्पना, विचार, चरित्र रूप में समुदाय परंपरा मानव, परिवर्तन सहज संभावना को स्वीकार करते ही आया। जिसके आधार पर आज प्रमाण सहज जागृति के लिए हम मानव प्रतीक्षित रहे आए हैं। फलत: जागृति अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था के अर्थ में फलीभूत होना निश्चित है। मानवीयता सहज जागृति का नित्य स्रोत सहअस्तित्व है, जागृति की नित्य प्रक्रिया सहअस्तित्व है। जागृति का निरंतर धारक-वाहक जागृत मनुष्य ही हैं। इस प्रकार जागृति की स्थिति, गति, संभावना स्पष्ट है।
मानव का ही मूल्य और मूल्यांकन सहित जीने की कला, विचार शैली और अनुभव बल संपन्न होना सहज हैं। और कोई वस्तु जागृति के लिए अथवा सर्वतोमुखी जागृति को प्रमाणित करने के लिए समीचीन नहीं