मानव करता आया है। अभी भी सर्वाधिक लोग विश्वास करते हैं। अभी की स्थिति में, कई देशों में, जिस वस्तु को जिस नाम से बेचा जाता है, उस नाम की वस्तु का जो सहज रूप गुण होता है, उससे भिन्न या विकृत वस्तुओं को बेचकर लाभोन्माद की तुष्टि देता हुआ आदमी देखने को मिलता है। जैसे चावल में पत्थर मिलाकर बेचना। इसी प्रकार औषधि द्रव्यों में भी मिलावट की बात देखी गई हैं। यह लाभोन्माद से ही आता है। लाभोन्माद संग्रह के रूप में विनियोजित रहता है। यह उदाहरण यहाँ इसलिए दिया गया है कि वस्तुओं को खरीदते समय ही मानव सहज रूप में ही विश्वास से खरीदता हैं। उस वस्तु के निष्प्रयोजन और विकल्प की स्थिति में पीड़ित होना स्वाभाविक है । इससे पता लगता है कि एक तो मूल्यों की मूल्यांकन विधि में, मूल्यांकन में जो ज्यादा कम वाली बात है, वह अपने प्रकार की दो स्थितियाँ निर्मित करता है। दूसरी यह भी बात समझ में आती है कि वस्तु की पवित्रता, गुणवत्ता पर प्रश्न चिन्ह लग गए है? इसलिए मानव की व्यवस्था प्रणाली में, प्रत्येक व्यक्ति व्यवस्था में भागीदार है, इस कारण व्यापार मानसिकताएँ ग्राम मूलक उत्पादन और समृद्घि सहज मानसिकता में विकसित होना स्वाभाविक है।
समृद्घि, व्यवस्था में भागीदारी होने के प्रमाण में अपने-आप प्रमाणित होती है। अपने आप का मतलब नियति सहज रूप में ही समझने से है। मानव में संपूर्ण उपलब्धियाँ समाधान, समृद्घि, अभय, सहअस्तित्व ही है। यही व्यवस्था में, से, के लिए जीने की कला सहज प्रमाण है। व्यवस्था में भागीदारी क्रम में समाधान, समृद्घि सहज पाया गया। यह बुद्घिजीवियों का प्रश्न हो सकता है कि अव्यवस्था बहुल समुदाय परंपराओं में व्यवस्था सहज विधि से जीना कैसे बन पाएगा? उसको ऐसा देखा गया, किया गया और मूल्यांकन भी किया गया कि परंपरा से अधिक जागृत होने की संभावना समीचीन रहता ही है। इस बात का ज़िक्र पहले भी किया गया है। इसी क्रम में हर वर्तमान में ऐसे व्यक्ति के होने की संभावना से कोई भी बुद्घिजीवी इन्कार नहीं कर सकता। इसके प्रमाणों में भौतिकवादी विधि से अनेक अनुसंधान ज्ञान परंपरा में प्रचलित नहीं था। इसी प्रकार आदर्शवादी विधि में भी बहुत सारे महापुरुष अपने को मौलिक रूप में व्यक्त किये, जिनकी गुण गाथा सम्मान और आस्था के साथ आज भी किया जाना देखने को मिल रहा है। इसी नियति क्रम में अर्थात् जागृति क्रम में मध्यस्थ दर्शन, सहअस्तित्ववाद को व्यक्त करने से पहले जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन और मानवीयता पूर्ण आचरण सहज विधि से, जी कर देखा गया, उसके अनंतर ही ग्रंथ को लिखने की प्रक्रिया शुरु की गई।
अस्तित्व दर्शन, जीवन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण सहित जीने के क्रम में यह देखा गया है कि जीवन ज्ञान के साथ ही स्वयं के प्रति विश्वास हुआ। श्रेष्ठता के प्रति सम्मान करना सहज हो गया। जीवन ज्ञान को कुछ लोगों में प्रबोधन पूर्वक अवधारणा में लाए और उन्हीं के चिंतन और व्यवहाराभ्यास के योगफल में