उनमें भी स्वयं के प्रति विश्वास, श्रेष्ठता के प्रति सम्मान करना प्रमाणित हुआ। अस्तु, इसी क्रम में यह देखा गया कि व्यक्तित्व एवं प्रतिभा में संतुलन स्थापित हुआ। जिसके प्रमाण में व्यवहार में सामाजिक, व्यवसाय में स्वावलंबन सहज आवश्यकता महसूस हुई, स्वीकार हुई, उसी विधि से जीया गया। इसलिए स्वयं में, से, के लिए प्रमाण होने के फलस्वरुप, मानव में, से, के लिए प्रमाण होने की संभावना पर विश्वास किया है। इसी सत्यतावश यह अभिव्यक्ति मानव के सम्मुख अर्पित हुई है।
उपर्युक्त क्रम में जागृति स्पष्ट हो गई। यह अस्तित्व दर्शन, जीवन ज्ञान की संयुक्त महिमा के रूप में स्पष्ट हुई। इसी महिमावश मानवीयता पूर्ण आचरण ध्रुवीकृत, समीकृत विधि से समझ में आया। इसके लोक व्यापीकरण की सहज संभावना भी समझ में आई। तथा दो विधियों से आई विचारधारा, कहाँ-कहाँ निग्रह बिंदु में आई, यह बात भी समझ में आई। अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन सहज प्रकाश में सभी निग्रह बिंदुओं का समाधान समझ में आया तब इसको प्रस्तुत करना उचित समझ लिया।
जीवन ज्ञान का लोक व्यापीकरण होता है, इसको सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थाओं में भी प्रयोग किया गया। यह संप्रेषित होता है इसका प्रमाण मिला। फलस्वरुप रहस्य का उन्मूलन करने में विश्वास किया। इस प्रकार हर व्यक्ति अपने में प्रयोग कर देख सकता है जीवन ज्ञान में पारंगत होने के उपरान्त:-
1. स्वयं के प्रति विश्वास होता है।
2. श्रेष्ठता के प्रति सम्मान होता है।
3. जीवन में ही रहस्य से मुक्ति मिलता है।
4. मानव जागृत होकर देवमानव, दिव्यमानव होता है, यह सत्य समझ में आता है। फलस्वरुप देवी-देवता संबंधी रहस्य से मुक्ति मिलता है।
5. अस्तित्व दर्शन सहज रूप में ही होता है। फलस्वरुप ईश्वर संबंधी रहस्य से मुक्ति मिलता है।
6. अस्तित्व ही सहअस्तित्व के रूप में समझ में आता है।
इस विधि से अज्ञात को ज्ञात करने का उपाय सहज ही समझ में आता है। इस प्रकार धर्म संबंधी रहस्य सहअस्तित्व विधि से, प्रमाण संपन्नता सहित सार्वभौम व्यवस्था और अखण्ड समाज रचना और उसकी निरतंरता में, से, के लिए संपूर्ण बोध सहित कार्य प्रयास आरंभ हुआ।
ऊपर कहे अनुसार मानव किसी भी देश, काल में जीवन विद्या में पारंगत होने के उपरान्त व्यक्तित्व और प्रतिभा में संतुलन सहित, व्यवहार में सामाजिक, व्यवसाय में स्वावलंबी होना संभव होता है। इसे एक से अधिक व्यक्तियों में देख लिया गया। इन आधारों पर परिवार परिवार समूह, ग्राम मोहल्ला परिवार, ग्राम समूह परिवार, क्षेत्र परिवार, मंडल परिवार, मंडल समूह परिवार, मुख्य राज्य परिवार, प्रधान राज्य परिवार,