विकल्प “मानव संचेतनवादी मनोविज्ञान” के रूप में भोगोन्मादी समाज चेतना अथवा “भोगोन्मादी समाज शास्त्र” के स्थान पर “व्यवहारवादी समाजशास्त्र” विकल्प।
इसी प्रकार “लाभोन्मादी अर्थशास्त्र” के स्थान पर “व्यवहारवादी समाजशास्त्र” विकल्प के रूप में प्रतिष्ठित होना स्वाभाविक रहा है, क्योंकि उन्मादों से होने वाली पीड़ाओं से अथवा उन्मादों से होने वाली अव्यवस्थाओं की पीड़ा से अधिकांश मानव पीड़ित हो चुके हैं।
भ्रम से बेहोशी की ओर जो घनीभूत होंगे वे ही इस पीड़ा नहीं समझ पाएँगे, ऐसे लोग भी कम ही होंगे। अस्तु, इन (विकल्पात्मक) प्रबंधों को शिक्षा में अपना लेने से शिक्षा का मानवीयकरण संभव हो सकेगा। ऐसे आवर्तनशील अर्थचिंतन, व्यवहारवादी समाजशास्त्र और मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान सहज ऐश्वर्य से संपन्न होने के लिए द्वंदात्मक भौतिकवाद के स्थान पर समाधानात्मक भौतिकवाद, द्वंदात्मक जनवाद के स्थान पर व्यवहारात्मक जनवाद और रहस्यात्मक अध्यात्मवाद के स्थान पर अनुभवात्मक अध्यात्मवाद की आवश्यकता अनिवार्यता है ही, जो पहले स्पष्ट की जा चुकी है। ये सब उपलब्ध हो गए हैं।
इन छः प्रबंधों को पाने के लिए अस्तित्व दर्शन, जीवन ज्ञान और मान्यता पूर्ण आचरण रूपी समझदारी के प्रतिपादन सहज रूप में, मध्यस्थ दर्शन प्रतिपादित हुआ है। जो स्वयं “मानव व्यवहार दर्शन”, “मानव कर्म दर्शन”, “मानव अभ्यास दर्शन” और “मानव अनुभव दर्शन” की अभिव्यक्ति है।
इस दर्शन के आधार पर वाद और शास्त्र निर्मित हुआ। इसे मानव परंपरा में अर्पित करने का संकल्प स्वयं प्रेरित है। इस अनुसंधान के मूल में अव्यवस्था की समझ में जो पीड़ाएँ थी, उन्हें दूर करना ही प्रधान कारण रहा है। अ. व. (146 – 156)
सार्वभौमता का पहचान
सम्पूर्ण मानव परम्परा सदैव से तर्क का प्रयोग करता ही आया है। क्योंकि कल्पनाशीलता कर्म स्वतंत्रतावश तर्क का उद्घाटन अपने आप में उद्गमित होता रहा। सम्पूर्ण उद्घाटन में मानव में समानता का आधार भी बना हुआ है। जैसे संख्या का पहचान सभी देश भाषा में एक ही सा है। एक “दिन” पहचानने का स्वर एक ही है। मानव जाति को पहचानने के स्थान पर जाति का नाम कुछ का कुछ दे रखा है। मानव धर्म को पहचानने के स्थान पर कुछ न कुछ नाम दे रखा है। मानव को ईश्वर को व्यापक रूप में पहचानना था उसके स्थान पर अपने अपने ढंग से कुछ न कुछ मान रखा है। मानव कुल सार्वभौम व्यवस्था को पहचानना था, व्यवस्था के नाम पर कुछ न कुछ मनमानी करता है। मानव कुल सत्य को पहचानने की आवश्यकता पर सहअस्तित्व रूपी अस्तित्व को पहचानना था उसके स्थान पर कुछ न कुछ मान रखा है।
इस प्रकार बहुत सारे चीज सार्वभौम नहीं हो पाया, कुछ चीज सार्वभौम हुआ भी अर्थात सर्वमानव स्वीकृति एक सा है, जैसे धरती, परमाणु की स्वीकृति, पदार्थावस्था मृत, मणि, पाषाण, की स्वीकृति, अन्य वनस्पति की स्वीकृति,