स्पष्ट है। इस प्रकार अस्तित्व में संपूर्ण वस्तुओं का मौलिक तत्व सहज रूप में जान पहचान सकते हैं, फलत: निर्वाह कर सकते हैं। संपूर्ण पहचान मौलिकता और मूल्यांकन ही है।
अस्तित्व सहज रूप में देखने पर पता चलता है कि पदार्थावस्था में स्वभाव संगठन-विघटन के रूप में कार्यरत है।
हर इकाई का विघटित होने के उपरान्त संगठन की संभावनाओं को इस प्रकार देखा जा सकता हैं कि हर परमाणु-अणुएँ संगठन में भागीदारी निर्वाह करने के प्रयास में ही रहते हैं। फलत: परमाणु के रूप में सभी (परमाणु) अंश प्रतिष्ठा पाते हैं। हर अंश अपने को संगठन प्रतिष्ठा में पाकर ही व्यवस्था में भागीदार होना प्रमाणित कर पाता है। इस प्रकार पदार्थावस्था में हर वस्तु को संगठन के आधार पर ही अथवा एक परमाणु में निहित अंशों की संख्या के आधार पर ही उस परमाणु की प्रजाति, मात्रा और कार्य को पहचान पा रहे हैं और वह स्वयं व्यक्त होता हुआ दिखाई पड़ता है। अस्तु, पदार्थावस्था में गठन के आधार पर, वह भी संगठन के आधार पर मौलिकताएँ प्रमाणित है।