सहज है। दूसरे विधि से अन्तर समाधान-बाह्य समाधान का अनुभव किया जा सकता है। यह भी देखा गया है कि समाधान क्रम में ही सुखानुभव होना पाया जाता है।
सुख का प्रमाण ही है वर्तमान में विश्वास। वर्तमान में विश्वास होने का मूल तत्व ही है वर्तमान में व्यवस्था। व्यवस्था का मूल स्वरूप ही है हर वस्तु को अथवा हर-एक को जीने देना और जीना और वर्तमान में समृद्धि, समाधान, अभय, सह-अस्तित्व का प्रमाणीकरण करना। यही जागृतिपूर्वक प्रमाणित होने वाली विधि है। अ.श. (87-89)
उन्मादों, आवेशों में रहते, जितने भी मोटे आदमी हों, वह भय और शंकाओं से घिरा रहता है, इसलिए वह कमजोर होता ही हैं। आवेशों में कमोबेशी, आदमी में कोई ताकत रह नहीं जाती। समस्याओं से ग्रसित मानव कमजोर होता है। इसी भाँति लाभोन्माद, कामोन्माद, भोगोन्माद से ग्रस्त आदमी मानसिक रूप में कमजोर होता है तथा शरीर रूप में भी कमजोर होता है क्योंकि मानसिकता ही शरीर के द्वारा ताकत को प्रदर्शित करता है। इससे एक सहज निश्चय निकलता हैं कि “अमानवीयता मानव में, मानव से, मानव के लिए कमजोर स्थिति है।” भले ही वे राक्षस मानव, पशु मानव क्यों न हो पर वे अमानव तो हैं, इसलिए इन दोनों का मानवीयतापूर्ण मानव से कमजोर होना स्वाभाविक है।
क्योंकि मानव का स्वभाव (मौलिकता) धीरता, वीरता, उदारता है। वहीं अमानव का अर्थात पशु और राक्षस मानव का स्वभाव हीनता, दीनता, क्रूरता ही है।
मानव सहज मौलिकता कितनी सुद़ृढ़ है, यह हर एक व्यक्ति को समझ में आता है। इससे पता चलता है कि अमानवीयता की मुक्ति स्थली, स्वयं मानवीयतापूर्ण स्वभाव ही वैभव हैं। इसलिए अमानवीयता का, मानवीयता पूर्वक अथवा मानवीयता की विधि से परिवर्तन होना सहज हैं, क्योंकि अमानवीयता को कोई भी मानव (जो अमानवीय रहता है वह भी) नहीं स्वीकारता जबकि मानवीयता को हर व्यक्ति स्वीकारता हैं। मानवीयता के खोल में ही, अमानवीयता पनपती हुई देखने को मिल रही हैं।
ऐसा मजबूर होने का एक ही कारण है, परंपरा में मानवीयता का जीता जागता प्रमाण, बोध गम्य होने योग्य ज्ञान, दर्शन सुलभ न होना।
इसे ऐसा भी एक सर्वेक्षण किया जा सकता है कि किसी भी नशाखोर व्यक्ति से विधिवत् किसी मुद्दे पर ज्ञानार्जन, विवेकार्जन विधि से बात करें, तब हम यह पाएँगे कि नशा किया हुआ व्यक्ति भी नशा नहीं किया हुआ जैसा प्रस्तुत होना चाहता है। एक चोर, डाकू से विवेक और व्यवस्था संबंधी चर्चा कर देखें तो हम यही पाते हैं कि चोरी-डकैती करते हुए उसी के पक्ष में व्यवस्था व विवेक को उपयोग करते हुए नहीं मिलता है। अपितु, इसके विपरीत जो भी करते रहता हैं, किया रहता हैं उसी की निरर्थकता को बार-बार दोहराते रहता है।
इसी प्रकार लाभोन्मादी, कामोन्मादी व भोगन्मादियों से व्यवस्था और विवेक प्रयोजन विधि से विधिवत् चर्चा करके हम यह पाते हैं कि सभी उन्माद निरर्थक है।
इसी प्रकार आज के राजनेताओं से इस मुद्दे पर चर्चा करके देखें कि वोट, नोट, बँटवारा, संतुष्टि, असंतुष्टि कब तक चल सकती हैं? इससे स्वस्थ व्यवस्था मिल सकती हैं क्या? इस पर वे कहते हैं कि “सबकी संतुष्टि हो नहीं सकती,