इसके लिए जीवन विद्या कार्यक्रम योजना और ज्ञान प्रमाणित होने को आगे प्रस्तुत किया गया है।
ऐसा अक्षय बल, अक्षय शक्ति संपन्न जीवन ही जागृति पूर्वक द़ृष्टापद में वैभवित होने और प्रमाणित होने का कार्य सहज ही कर पाता है; जब से मानव परंपरा जागृत हो जाये तभी से। परम्परा जागृत होने के क्रम में ही विकल्पात्मक दर्शन, विकल्पात्मक विचारधारा और विकल्पात्मक शास्त्रों को अर्पित करने के क्रम में ही यह “समाधानात्मक भौतिकवाद” एक प्रबंध है। इस प्रबंध में अस्तित्व सहज अध्ययन प्रस्तुत करना हमारी प्रतिबद्घता है। अस्तित्व निरतंर व्यक्त रूप है। इसका प्रमाण वर्तमान है। अस्तित्व स्वयं समाधान रूप है।
मानव की भ्रमित बुद्घिवश सम्पूर्ण समस्याएँ मानव के लिए, समुदाय कल्पनावश मानव से निर्मित हैं।
इस बीच नैसर्गिकता के साथ जो कुछ भी अपराध, अत्याचार मानव ने किया है, उसके कुछ परिणाम मानव को भयभीत करने के रूप में घटनाएँ देखने सुनने को मिल रही हैं। जैसे- प्रदूषण, ऋतु असंतुलन, भूमि के वातावरण में असंतुलन आदि। मानव के साथ मानव समुदाय चेतना के आधार पर विकसित, अविकसित के आधार पर जो कुछ भी द्रोह, विद्रोह और शोषण हुआ है, उससे युद्ध का प्रभाव और भावी महायुद्ध की संभावना ने मानव को आकुल-व्याकुल कर दिया हैं। आज मानव के पास समाधान की कोई दिशा न होने से मानव के प्रताड़ित, शोषित होने को स्वीकारने की विवशता में मानव आ गया है।
पर इसका निराकरण एक विधि से हैं- वह है “समाधान विधि”। अस्तित्व स्वयं समाधान है, इसीलिए अस्तित्व सहज विधि से ही सर्वमानव के समाधानित होने का सूत्र और संभावना समीचीन हैं। इसकी आवश्यकता को अधिकांश लोग अनुभव कर रहे हैं।
पूरकता विधि से समाधान:-
अस्तित्व में समाधान, दर्शनक्रम में किसी एक की भी ख्याति समाप्त नहीं हो सकती, चाहे मानव कितना भी समस्यात्मक प्रयत्न कर ले। अर्थात् कोई न कोई मानव संतान ही सर्वशुभ समाधान के लिए प्रयत्नशील रहता ही है। इससे यह ज्ञान, विवेक और प्रक्रिया सुलभ होती हैं कि एक दूसरे को मिटाने की आवश्यकता नहीं। सभी अवस्थाओं का अपना-अपना उपयोग, सदुपयोग, प्रयोजन अस्तित्व सहज विधि से ही अनुबंधित है। यही पूरकता विधि है। भ.व. (101-105)
जागृति पूर्वक संज्ञानीयता, भ्रमित में केवल संवेदनशीलता रहता है।
हर मानव, हर परिवार, हर समुदाय समाधान समृद्धि अभय, सहअस्तित्व को वरता है। वरने का तात्पर्य सुनने मात्र से ही कोई भूला हुआ चीज को स्मरण में ला लेना और स्वीकार लेने से है। वर लिया है-का तात्पर्य पहले से ही इन आकाँक्षाओ से सम्पन्न रहने से भी है। ज.व. (47)