मानव एवं अन्य प्रकृति में मौलिक विशेषता यह है।

  • मानवीय परम्परा में जीवन अपनी जागृति को, शरीर द्वारा व्यक्त कर सकता है, करना चाहता है।
  • मानव ही कर्म स्वतंत्र - कल्पनाशील है।
  • भ्रमित रहते तक मानव ही कर्म करने में स्वतंत्र, फल भोगते समय परतंत्र है।
  • मानव ही मनाकार को साकार करने वाला, मनः स्वस्थता का आशावादी है।
  • मानव ही जागृति पूर्वक अपने स्वत्व स्वतंत्रता, अधिकारों को परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था और अखंड समाज रूपी सार्वभौम व्यवस्था के रूप में प्रमाणित करता है।

इन पांचों प्रकार से मौलिकताओं की सहजतावश, जागृति पूर्वक ही मानव का संतुलित, नियंत्रित, नियमित होना, स्वानुशासन, स्वयं व्यवस्था, व्यवस्था में भागीदारी, सम्बन्धों की पहचान, मूल्यों का निर्वाह सहज उत्साह, स्वयं स्फूर्त उत्सव के रूप में आचरित होगा। ऐसा हर मानव होना चाहता है। म.वि. (124-125)

भ्रम – निर्भ्रम :- मानव द्वारा स्वयं को अध्ययन करना संभव है।

अब यह प्रश्न होता हैं कि निषेध शब्द है क्या? इसका सहज उत्तर यही हैं कि “यह भ्रमित मानस का प्रकाशन है।” यह भ्रमित कल्पना का प्रकाशन है और भ्रमित इच्छाओं का प्रकाशन हैं। इन चारों प्रकार से भ्रमित प्रकाशन का आधार केवल मानव ही हैं। अब यह भी प्रश्न हो सकता है कि मानव भ्रमित होता क्यों है? भ्रम में फंसता क्यों है? इसका उत्तर अस्तित्व सहज रूप में देखा गया हैं कि मानव एक ऐसी वस्तु (वास्तविकता) है, जिसमें मानवेतर प्रकृति से भिन्न मौलिक वर्चस्व सम्पन्नता सहज उत्सव जैसा - विधि एवं निषेध से नियंत्रित होना है।

इनमें से प्रथम- कर्म स्वतंत्रता है। दूसरा- कल्पनाशीलता है। तीसरा- कर्म करते समय में स्वतंत्र, फल भोगते समय में परतंत्र हैं। चौथा- अपनी परिभाषा में मनाकार को साकार करने वाला मन:स्वस्थता का आशावादी एवं प्रमाणित करने वाला है।

ये सब मौलिकताएँ प्रत्येक मानव में निरीक्षण, परीक्षण पूर्वक देखना सहज है। इन्हीं सब ऐश्वर्यों के चलते जागृति पूर्वक मानव ही अस्तित्व में द़ृष्टा है- यह मौलिकता भी मानव की झोली में रखी हुई है। ये सब रहते हुए भ्रमित होने का मूल तत्व यहीं हैं, सशक्त तत्व यही हैं-

1. अभी तक बनी हुई व्यक्तिवादी, समुदायवादी परंपराएँ है।

2. नैसर्गिकता है। (प्राकृतिक)

3. वातावरण है। (मानवकृत)

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