इस बीच में झेलते रहना ही राजनीति है।” इन सभी वर्गों के साथ बात करने पर उनकी यह स्वीकारोक्ति है कि उन-उन कार्यों की बड़ी मजबूरी रही हैं, लेकिन ये सारे “उचित काम” नहीं हैं। इन लोगों से पूछा गया कि ये ठीक नहीं है तो करते क्यों हो? इस पर वे कहते है कि “इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं हैं।” इसी प्रकार युवा पीढ़ी से पूछा गया कि, “जो कुछ भी आप लोग कर रहे हैं, सोच रहे हैं- नशाखोरी, जमाखोरी, जिम्मेदारी-विहीन कार्य आदि क्या ये ठीक हैं? - ऐसा पूछने पर वे कहते हैं कि “ईमानदारी से रोटी नहीं मिलती।” जिम्मेदारी से बात या काम किये तो पिस जाते हैं।” ऐसी दो टूक बातें युवा पीढ़ी करती है। मानवीयता के बारे में जब उनसे पूछते हैं तो ये कहते हैं “यह तो जरुरी हैं।”
इस तरह इन तथ्यों के आधार पर यही समझ में आता है कि अन्याय, भ्रष्टाचार, दुराचार करने वाला व्यक्ति भी मानवीयता को एक आवश्यकता के रूप में स्वीकारता है। ऐसे भी बहुत से महत्वपूर्ण लोगों की बातें की गई।
इनमें धर्म गद्दी पर बैठे लोग भी रहे हैं, उनसे मानवीयता के संबंध में चर्चा की गई तो सभी ने मानवीयता को नकारना अनुचित बताया और मानवीयता की आवश्यकता बताई। उनकी भागादारी के बारे में पूछने पर वे कहते हैं कि “भागीदारी की बात तो हम कर नहीं सकते क्योंकि हमारा अभी तक किया हुआ, इस नजरिए से, बाकी सब वृथा लगने लगता हैं। इसलिए हम इसे (विकल्पतमक प्रस्ताव सहअस्तित्ववाद) नहीं ले जा सकते।” इत्यादि। यह भी देखने को मिला कि ख्याति प्राप्त साधु, संत, मुनि ये लोग अपने को उन सबसे अच्छा मान लेता हैं, यही कि वे मानवीयता से अपने को श्रेष्ठ मान लेते हैं।
उनके अनुसार मानवीयता सामान्य मनुष्य की कथा है, उनके अनुसार वे स्वयं अपने को मानवीयता से अधिक श्रेष्ठ मानकर, अपने संभाषणों को समाप्त करते हैं।
इसका मतलब यह हुआ कि साधु, सन्यासी, संत सभी मानवीयता की आवश्यकता से सहमत होते हैं। ये उस मानवीयता की मापदण्ड से भिन्न है- ऐसा समझ में आता है। लेकिन मानवता को सभी उचित ठहराते हैं। इस प्रकार सर्वाधिक लोगों को यह स्वीकृत है ही। इस विधि से मानवीयता का नाम सबको स्वीकृत है। मौलिकता भी सबको स्वीकृत है। मानवीय ज्ञान, जीवन ज्ञान है। जागृत मानव ही द़ृष्टा पद (देखने वाला, समझने वाला) में हैं। अस्तित्व ज्ञान सभी मानवों को संभव हैं- इन बातों को रुढ़िवादी, कट्टरपंथी लोग जल्दी नहीं स्वीकारते, किन्तु विरोध करना भी नहीं बन पाता। भ.व. (204-207)
उपरोक्त चर्चा से इस निष्कर्ष पर पहुंचते है कि सुंदर-समाधान प्रत्येक मानव शुभ, सुन्दर-समाधान सहज सह-अस्तित्व को अनुभव करना चाहता है। ऐसी अनुभूति के लिए अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चितंन अध्ययनार्थ प्रस्तुत है जिसके लिए हर मानव प्रतीक्षारत है। ऐसी अनुभूति ही सुख-शान्ति, संतोष और आनंद का स्वरूप है। म.वि. (156)