सम्पूर्ण अस्तित्व में प्रत्येक एक व्यापक में स्थित अनंत सहज वातावरण ही है। “नैसर्गिकता” धरती, हवा, पानी और हरियाली एवं जीवों के रूप में देखने को मिलती हैं। प्रत्येक मानव को संस्कार परंपरा से ही मिलते हैं। यह सब नित्य प्रमाण ही हैं। इन्हीं के आधार पर केवल मानव की देन रुपी शिक्षा-संस्कार से ही मानव का भ्रमित होना देखा जा रहा है। इस मोड़ पर बुद्घिजीवी कहलाने वाले यह भी पूछ सकते हैं कि भ्रम-निर्भ्रम की बात छेड़ने वाला आदमी भ्रमित नहीं है?
इस बात को पहचाना कैसे जाये? क्योंकि पहले जिस वातावरण, नैसर्गिकता और परंपरा की बात कही गई हैं उसी में से किसी परंपरा में यह आदमी (लेखक) भी है। इस प्रकार से प्रश्न होना मानव की कल्पनाशीलता सहज वैभव है।
भ्रम-निर्भ्रम प्रश्न का उत्तर अस्तित्व में द़ृष्टा (जागृत) व्यक्ति दे सकता है। इसीलिए इस व्यक्ति ने भ्रम-निर्भ्रम की बात उठाई है। सहज रूप में (लेखक ने) अस्तित्व में पढ़ लिया है, देख लिया है, समझ लिया है। यहाँ यह स्मरण रखने योग्य है कि भौतिक-रासायनिक वस्तुओं को जब अवस्था के रूप में अध्ययन करने के लिए - “समाधानात्मक भौतिकवाद” संकल्पित हो गया, तब यह विश्वास करने के लायक है कि जो-जो बातें कही गई हैं वे अध्ययन के लायक हैं। इनके लिए किन्हीं पूर्व ग्रंथों का उद्धरण नहीं हैं। इसलिए इन बातों का अध्ययन करके जो भी इसे समझना चाहे, इसे समझा जा सकता है तथा इन बातों पर विश्वास किया जा सकता हैं।
इस आधार पर यह जो कुछ भी प्रस्तुत है, वह मूलत: “अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिन्तन” है। यह बात पहले भी कही जा चुकी है। इसको पढ़ने वाला और अध्ययन करने वाला मानव ही होगा और हर मानव अस्तित्व में ही वर्तमान हैं।
इन सहज तथ्यों को स्वीकारना पर्याप्त हैं। भ्रम-निर्भ्रम मानव में, मानव से, मानव के लिए जागृति क्रम से स्पष्ट होता हैं। जो था, वही वर्तमान हैं। इन दोनों बातों के लिए पुष्टि प्रस्तुत की जा रही है। इस सहज तथ्य में मानव ही देखने समझने योग्य हैं। अस्तित्व स्वयं वर्तमान है और अस्तित्व में मानव अविभाज्य रूप में वर्तमान है। यही ध्रुव बिन्दु हैं, जहाँ निर्णय कर सकते हैं कि जो भी हैं, वही होता है। यही उत्तर पाने की स्थिति हैं। मानव के सम्मुख मानव सहित चारों अवस्थाओं में प्रकृति सत्ता में दिखती हैं। इन चारों अवस्थाओं की प्रकृति (पदार्थ, प्राण, जीव, ज्ञानावस्था) इस धरती में दिखती हैं।
यह धरती स्वयं एक सौरव्यूह के अंगभूत कार्यरत दिखाई पड़ती हैं। यह सौरव्यूह अनंत सौरव्यूहों के अंगभूत रूप में कार्यरत दिखाई पड़ता है। दिखने से तात्पर्य समझने से ही हैं।
समझने की क्षमता प्रत्येक मानव में जीवन सहज रूप में समाई हुई हैं। जीवन तात्विक रूप में गठनपूर्ण परमाणु है। यह पहले स्पष्ट किया जा चुका है। जीवन में ही आशा, विचार, इच्छा और संकल्प तथा प्रामाणिकता रुपी अक्षय शक्तियाँ कार्य करती हुई, प्रत्येक मानव में दिखाई पड़ती है जिसका अध्ययन किया जा सकता है। इसी प्रकार मन, वृत्ति, चित्त, बुद्घि, आत्मा रुपी अक्षय बल प्रत्येक मानव में क्रियारत है। इसका विश्लेषण भी पहले स्पष्ट किया जा चुका है। स्मरण रखने योग्य तथ्य यह है कि जीवन सहज शक्ति और बल अविभाज्य रूप में कार्यरत रहते हैं। इसके अध्ययन के लिए वस्तु मानव है और अध्ययन संभव है। इसी विधि से प्रत्येक मनुष्य द्वारा स्वयं को अध्ययन करना भी संभव हो गया।