है। मानव ही इसका धारक वाहक है। संबंधो मे ही इसका प्रमाण होना शाश्वत सत्य है। इसी आधार पर मानव परिवार से अखण्ड समाज तक समाधान सूत्र को फैला पाते है। यही व्यवहारात्मक जनवाद का प्राण तत्व है।
हर व्यक्ति व्यवहार प्रवृति में रहता है क्योंकि किसी न किसी मानव के साथ जीना है।
मानव में होने वाले कुछ भी कार्यकलापो के अनन्तर अर्थात मानवेत्तर प्रकृति के साथ किया गया सभी कार्यकलाप के अनन्तर जीने का पहचान मानव के साथ ही सार्थक होता है। जीव जानवरो के साथ कितने भी हम प्यार से अथवा नाराजगी से, अपने मनमानी विधि से कर ले मानव के साथ ही हमे जीना होता है। अन्ततोगत्वा मानव के साथ मानव जागृतिपूर्वक नियम, मर्यादा, सम्मानो के साथ अपनी पहचान बना लेता है। ज.व. (67-69)
भ्रमित संसार में भी हर व्यक्ति एक दूसरे की नसजाल को जानते ही है अथवा हर बात को पहचानते रहते है। भ्रमित मानव परिवार में हर व्यक्ति एक दूसरे के दोषो को भी पहचाने रहते है। ऐसे पहचानने के आधार पर एक दूसरे के प्रति विश्वास पूर्ण विधि नहीं बन पाती है। एक छत के तले अवश्य ही रहते है। इस दूभरता में घुटन बनी ही रहती है। परस्परता में अविश्वास बढ़ता जाता है। अविश्वास के कारण अपने अधिकारों को वस्तु केन्द्रित किये जाना एक विवशता बन जाती है। ऐसी विवशता एक दूसरे के बीच खाई का काम करती है। फलस्वरूप असन्तुष्टि का विस्तार होता ही जाता है।
जितना ज्यादा असन्तुष्टि का विस्तार होता है उतना ही ज्यादा संग्रह सुविधा पर स्वामित्व को पाने का प्रयत्न होना पाया जाता है। फलस्वरूप व्यक्तिवादिता उभर जाती है।
परिवार में सुखी होने के लिए जीने की शुरुआत करते है। इसके विपरीत व्यक्तिवादिता में पहुँच जाते है यही संपूर्ण समस्या का कारण है। भ्रमवश अकेलापन सदा विरोध अथवा भय के स्वरूप में ही गण्य होता है। अकेलेपन से मुक्ति तभी हो पाती है जब परस्परता में विश्वास हो। कहीं न कहीं मानव अतिरिक्त विश्वास के लिए तड़पता है चाहे जीव जानवर के साथ ही क्यों न हो। इसकी कोई चिन्हित पहचान नहीं हो पाती है इसलिए बारंबार विश्वास का आधार बदलता है। और बदलते बदलते थकना भी कहीं हो जाता है। पुन: किसी अज्ञात व्यक्ति के साथ विश्वास सूत्र को जोड़ने का प्रयास भी करता है। मानव परंपरा भ्रमजाल में यथावत बनी हुई ही है। क्योंकि सर्वमानव में समझदारी सुलभ हुई नहीं है। मानव लक्ष्य जीवन लक्ष्य का प्रमाण लोकव्यापीकरण हुआ नहीं है।
यही मुख्य मुद्दा है इसी विफलता के आधार पर सर्वभौम व्यवस्था अखंड समाज बना नहीं है। यही संकट आज के लिए समस्त प्रकार की समस्या का कारण है। इसी भ्रमवश हर मानव भय प्रलोभन और समस्याओ के लिए स्रोत बना हुआ है। इससे छूटने से ही मानव कुल का कल्याण है। ज.व. (193-195)