इसी भ्रमवश ज्यादा और कम वाला भूत भय और प्रलोभन के आधार पर ही बन बैठा है। इसका निराकरण, तृप्ति स्थली को परम्परा में पहचानना ही है, निर्वाह करना ही है। जानना-मानना ही है।

इसके तृप्ति स्थली को हर मानव इस प्रकार देख सकता है और जी सकता है कि स्वयं में विश्वास, श्रेष्ठता के प्रति सम्मान, प्रतिभा और व्यक्तित्व में संतुलन, व्यवसाय (उत्पादन) में स्वावलंबी, व्यवहार में सामाजिक होने के उपरांत व्यक्ति स्वायत्त होता है और परिवार मानव के रूप में प्रमाणित होता है। यही वांछित, आवश्यकीय, सार्वभौम मानव का स्वरूप और गति स्पष्ट हो जाती है। अ.श. (180-182)

इस प्रकार हम पाते हैं कि:-

अस्तित्व में विकास होता है।

  • विकसित गठनपूर्ण परमाणु जीवन पद में संक्रमित रहता है।
  • प्रत्येक गठन पूर्ण परमाणु (तृप्त परमाणु) चैतन्य पद में संक्रमित होता है।
  • प्रत्येक चैतन्य इकाई अर्थात “जीवन” भार बंधन, अणु बंधन से मुक्त होता है।
  • प्रत्येक जीवन, जागृत होने के क्रम में आशा बंधन, विचार बंधन, इच्छा बंधन से पीड़ित रहता है। ऐसा पीड़ित होना ही भ्रम है। इसके विपरीत जागृत होना मानव में न्याय अर्थात् संबंधों का पहचान, मूल्यों का निर्वाह, मूल्यांकन क्रियाओं को परंपराओं में प्रमाणित करना जागृति है।
  • सर्वतोमुखी समाधान अर्थात स्वयं व्यवस्थित व्यवस्था होना और समग्र व्यवस्था में भागीदारी को निर्वाह करने का कार्य-कलाप के रूप में प्रमाणित करना जागृति है।
  • मानव का अस्तित्व में अनुभूत होने के प्रमाणों को प्रमाणित करना और स्वानुशासन रूप में जीने की कला को प्रमाणित करना परम जागृति है। इस प्रकार मानव परंपरा जागृति में, से, के लिए- यह स्पष्ट है।
  • भ. व. (111-113)
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