संबंध से परिवार, परिवार से समाज
मानव के साथ व्यवहार जुड़ा ही रहता है। व्यवहार सदा-सदा से मानव के साथ ध्रुवीकृत होता आया है। चाहे नकारात्मक हो चाहे सकारात्मक हो मानव अपनी परस्परता में व्यवहार करना सर्वस्वीकृत हो चुका है। मानव परम्परा में व्यवहार परस्परता में मूल्यों का निर्वाह करने के आधार पर ही प्रमाणित होता है। मूल्यों का निर्वाह संबंधो के आधार पर होना सर्वमानव को स्वीकृत है। मानव मानव के साथ सम्बन्धो को पहचानने की प्रवृति शिशु काल से ही निर्धारित है। यह शब्दो के रूप में सबको स्पष्ट है। मूल्यो के रूप में पहचान और उसकी निरन्तरता की आवश्यकता बनती है।
सम्बन्ध, उसकी पहचान और निरन्तरता ही विश्वास है। इस परिभाषा के आधार पर सभी सम्बन्धो के साथ संवाद अपेक्षित रहता है। हर संवाद की सार्थकता में समाधान है। संवाद की सार्थकता क्यो, कैसे, कितना का उत्तर पाने में ही है।
संबंध की परिभाषा ही है “पूर्णता के अर्थ में अनुबंधित रहना” ऐसे सम्बन्ध का स्वरूप निरन्तरता में ही वैभव और प्रयोजन प्रमाणित होना पाया जाता है। प्रयोजन मूलत: सहअस्तित्व में नित्य प्रमाण ही है। यही जागृति, वर्तमान में विश्वास (परस्परता में भय, शंका मुक्ति) और समाधान होना स्वाभाविक है। इन तीनो विधाओं के आधार पर अथवा इन तीनो विधाओ में प्रमाण होने के उपरान्त समृद्ध होना एक आवश्यकता, सम्भावना और इस हेतु प्रयास होना स्वाभाविक स्वयं स्फूर्त है। इसका तात्पर्य यही हुआ कि हम मानव समझदारी पूर्वक ही समाधानित होते हैं और वर्तमान में विश्वास अर्थात सम्बन्ध की पहचान और उसकी निरन्तरता बनाए रखने में निष्ठा ईमानदारी होने का प्रमाण है। पहचान और उसकी निरन्तरता स्वयं जिम्मेदारी के रूप में स्पष्ट होती है।
इस प्रकार समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी पूर्वक ही परिवार व्यवस्था में प्रमाण और समग्र व्यवस्था में भागीदारी होना और समृद्धि का साक्ष्य स्पष्ट होना पाया जाता है। इसके लिए परिवार में चर्चा, परिवार के कार्य-व्यवहार के लिए चर्चा, संवाद और परिवार लक्ष्य के लिए संवाद मानव परम्परा में सम्पन्न होना एक प्रतिष्ठा है।
हर मानव निश्चयता, निरन्तरता, अक्षुण्णता को स्वीकारता है। यह संवाद का एक मुद्दा है। हर निश्चयता क्यो, कैसे, कितना की कसौटी पर निर्धारित होती है। अत्याधुनिक युग में बेहतरीन जिन्दगी का नारा है। जो संग्रह-सुविधा पर आधारित है। संग्रह-सुविधा का तृप्ति बिन्दु नहीं है। प्राचीन अर्वाचीन स्वीकृतियाँ भक्ति-विरक्ति को बेहतरीन जिन्दगी मानी गई थी। इन दोनो नजरियों का व्यक्तिवाद में व रहस्य में अन्त होना सिद्ध किया जा चुका है।
व्यक्तिवाद ना तो परिवार व्यवस्था का आधार है, ना ही समुदाय व्यवस्था का आधार, समाज व्यवस्था तो कोसो दूर है। जबकि मानव समझदारी, मानवाकांक्षा, सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी पूर्वक वैभवित होता हुआ स्थिति में अखण्ड समाज में प्रमाणित हो जाता है।
व्यवस्था सार्वभौम होने के आधार पर ही अखंड समाज, अखंड समाज के आधार पर ही सार्वभौम व्यवस्था प्रमाणित होना पाया जाता है। प्रत्येक परिवार, अखण्ड समाह के अंतर्गत ही सार्थक होता है, प्रत्येक परिवार व्यवस्था सार्वभौम व्यवस्था के अंगभूत ही रहता है। अभी तक जितने भी समुदाय, समाज के नाम से प्रस्तुत हुआ, उन सब में अन्तर्विरोध