सहज पूर्ण जागृति प्रमाणित होने की व्यवस्था, आवश्यकता अस्तित्व सहज रूप में ही निहित है क्योंकि अस्तित्व स्थिर है, विकास एवम् जागृति निश्चित है।
जागृति को प्रमाणित करना जीवनापेक्षा है। जागृति सुख, शांति, संतोष, आनन्द है। इसे भले प्रकार से देखा गया है।
इसकी जीवन सहज निरंतरता होती है क्योंकि जीवन नित्य है। जीवन सहज जागृति अक्षुण्ण (निरंतर) होना भावी है। ऐसी जागृति और जागृति की अक्षुण्णता की प्यास हर व्यक्ति में निहित है। अतएव जीवन जागृति प्रणाली को परंपरा में अपनाना एक अनिवार्यता हैं। जीवन अपने में अनुभव, बोध, चिन्तन (साक्षात्कार) सहित ही किया गया चित्रण, विश्लेषण, तुलन, चयन और आस्वादन स्वाभाविक रूप में न्यायिक समाधानपूर्ण और प्रामाणिकता सहज अभिव्यक्ति, संप्रेषणा, प्रकाशन सहज कार्य-व्यवहार होना देखा गया है। अ.व. (57-59)
अनुभव सम्पन्न जीवन से ही जीवन सहज अभिव्यक्ति है। जबकि भ्रम भी ‘जीवन-भ्रम’ के आधार पर ही होना देखा गया है। अनुभव और जागृति, जीवन तृप्ति की अभिव्यक्ति होना पाया जाता है जबकि भ्रम अतृप्ति का ही द्योतक होना देखा गया। भ्रमित होने का, रहने का, कार्य करने का मूल रूप जीवन ही है। शरीर को जीवन समझने के आधार पर भ्रम है। जीवन को स्वत्व के रूप में समझ लेना और उसकी अभिव्यक्ति में जीवन जागृति प्रमाणित रहना ही अनुभव सहज प्रमाण एवम् जागृति है। अतएव यह स्पष्ट हुआ जीवन ही भ्रमित, जीवन ही जागृत होना नियति सहज क्रिया है।
भ्रमित स्थिति में मानवीयता के विपरीत, जीवों के सदृश्य (प्रिय, हित, लाभ प्रवृत्ति) जीना देखने को मिलता है।
जबकि मानव सहज मौलिकता मानवीयता ही है। जागृति सहज विधि से मानवीयता स्वयं-स्फूर्त विधि से प्रमाणित होती है। यही जागृति और भ्रम मुक्ति सहज प्रमाण है। इसी के आधार पर मानवीयतापूर्वक व्यवस्था में जीना बनता है, भ्रम पूर्वक अमानवीयता अर्थात् पशु मानव एवम् राक्षस मानव के रूप में जीना आंकलित होता है, जबकि हर व्यक्ति मानवीयता से परिपूर्ण होकर जीना चाहता है।
इस प्रकार हम इस निष्कर्ष पर आते हैं परंपरा जागृत होने की आवश्यकता है क्योंकि हर मानव संतान किसी अभिभावक के कोख में होता ही है।
इसके उपरांत किसी धर्म संस्थान, राज्य संस्थान और किसी शिक्षा संस्थान में अर्पित होता ही है। यही संस्थाएँ जागृति का धारक-वाहक होने पर जागृत परंपरा है अन्यथा भ्रमित परंपरा है ही। जागृति सबका वर है। जागृति का स्वरूप है स्वयं व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी, दूसरे विधि से मानवीयतापूर्ण आचरण जागृति है और तीसरे विधि से परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था में जीना जागृति है। इंगित किये गये तथ्यों और उनके विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि जीवन ही भ्रमित रहता है, जीवन ही जागृत रहता है। जीवन जागृति और भ्रम का स्त्रोत प्रधानत: मानव परंपरा ही है। परंपरा स्वयं जागृत रहने की स्थिति में जागृति का लोकव्यापीकरण होता है।
भ्रमित परंपरा होने की स्थिति में भ्रम का ही लोकव्यापीकरण होता है। इस दशक तक यही हाथ लगा है।