• <strong>उदारता:-</strong> यह जागृत सहज रूप में हैं। अविकसित के विकास में, संबंधों को निर्वाह करने में, श्रेष्ठता को सम्मान करने में, परिवार; ग्राम परिवार; विश्व परिवार की उपयोगिता-सदुपयोगिता विधि से तन-मन-धन रुपी अर्थ को सदुपयोग सुरक्षा करते हैं। इस प्रकार धीरता, वीरता, उदारता मानवीय स्वभाव के रूप में देखने को मिलता है।

आज भी किसी-किसी व्यक्ति में इसे सर्वेक्षित किया जा सकता है। इसे सर्व जन सुलभ करने की योजना और कार्य के लिए प्रयास कर सकते हैं। इस प्रकार मानव सहज मानवीयता पूर्ण स्वभाव सहज रूप में ही मौलिकता हैं। ऐसी मौलिकता प्रत्येक नर-नारी में जीता-जागता मिलने के लिए व्यावहारिकता में प्रमाणित होने के लिए, परम्परा जागृत रहना एक अनिवार्य स्थिति है। ऐसे मानव सहज मौलिकता किसी समुदाय में अभी तक सार्थक रहा हो, प्रमाणित रहा हो, व्यावहारिक रहा हो, संविधान और व्यवस्था में पहचान बन चुका हो, शिक्षा परंपरा में प्रवाहित हो चुका हो, संस्कार परंपराओं में मानवीयता को पहचाना हो, ऐसा कोई उदाहरण अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है। इसलिए भी विकल्प की आवश्यकता, अनिवार्यता स्पष्ट होती है।

व्यवहार के नियम

व्यवहार के नियम = स्वनियंत्रण

= जीने के निश्चित, सार्वभौम नियम

= बौद्धिक, सामाजिक, प्राकृतिक नियम

बौद्धिक नियम = असंग्रह (समृद्धि), विद्या, सरलता, स्नेह, अभय

= बौद्धिक नियंत्रण

सामाजिक नियम = स्वधन, स्वनारी / स्वपुरुष, दयापूर्ण कार्य व्यवहार

= चरित्र

= सामाजिक नियंत्रण

प्राकृतिक नियम = पूरकता, विकास, सहअस्तित्व

= नैसर्गिक नियंत्रण

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