शिष्य की गुरु से प्रत्याशा रहती है कि उसकी वांछा तथा जिज्ञासा के आधार पर उन्हीं दिशाओं में गुरु द्वारा अध्ययन कराया जाएगा। गुरु और शिष्य दोनों में उपलब्धि की कामना की साम्यता है। प्रक्रिया में पूरकता है। एक प्रदाता है और दूसरा प्राप्तकर्त्ता है। प्राप्तकर्त्ता और प्रदाता की एक ही अभिलाषा है कि ‘बोध’ पूर्ण हो जाये।
जिस पक्ष में शिष्य का बोध-पूर्ण हो जाता है, उस समय गुरु पर्व मनाता है अर्थात् गुरु को प्रसन्नता की अनुभूति होती है, जिसको वात्सल्य कहते हैं। तात्पर्य यह है कि हर एक बड़े अपनों से छोटों में वांछित गुणों की प्रसारण क्रिया में तत्पर रहते हैं।(व्य.द. 1978, 158)।इसके बदले में जो तोष (उत्सवित होना) वे पाते हैं, वही इसकी उपलब्धि है। प्रदाय के बदले में किसी भौतिक वस्तु की प्राप्ति की अभिलाषा नहीं रहती।
शिष्य का गुरु के साथ विश्वास सहित पहचान किया रहना सहज है। यह स्वाभाविक मिलन है। योग, मिलन के रूप में स्पष्ट होता है। गुरु-शिष्य का योग अपने में जागृति के आकाँक्षा पूर्वक कार्य-व्यवहार और अध्ययन करना, क्योंकि गुरु ही अध्ययन कराने वाला होना सुस्पष्ट है। अध्ययन कराने के क्रम में सदा-सदा शिष्य द्वारा ग्रहण करने की अपेक्षा व विश्वास समाया रहता है। उसमें जितने भी शिष्य सार्थक होते हैं, गुरु में प्रसन्नता का स्रोत समाया रहता है, यह स्पष्ट हो चुका है। यही गुरु-शिष्य के परस्परता में सफलता का प्रमाण है। जैसे-जैसे शिष्य का आकाँक्षा और जिज्ञासा शांत होता है, वैसे ही सभी संशय दूर होते जाता है। ऐसे संशय मुक्ति विधि से गौरव, श्रद्धा, कृतज्ञता मूल्य शिष्य में गुरु के लिए अर्पित होना पाया जाता है। इस प्रकार गुरु शिष्य में मूल्यों का मूल्यांकन पूर्वक उत्सवित होना स्वाभाविक होता है। - व्य.द. 124
5. पति-पत्नी संबंध
मानव परंपरा में विवाह संबंध अधिकांश लोगों में वांछित है। यह संबंध अपने-आप में परस्पर सर्वतोमुखी समाधान सहित विश्वास वहन करने की प्रतिज्ञा पूर्वक आरंभ होने वाला संबंध है। हर संबंधों में विश्वास वहन होना एक अनिवार्य और सामान्य स्थिति है। विवाह सम्बन्ध में भी विश्वास निर्वाह आवश्यक है ही। विवाह संबंध में होने वाले शरीर संबंध और उसकी अपेक्षा परस्परता में आयु के अनुसार विदित रहता है। इतना ही नहीं सर्वविदित रहता है। सभी संबंधों में जीवन सहज भागीदारी समान रूप में विद्यमान रहता है। विश्वास सभी संबंधों में जीवन सहज अपेक्षा है। क्रम से व्यवहार संबंध, व्यवस्था संबंध और शरीर संबंधों को विश्वासपूर्वक ही नियंत्रित किया रहना देखने को मिलता है।
शरीर संबंध माता-पिता के सम्बन्ध में गर्भाशय और उसमें निर्मित होने वाले शरीर के रूप में गण्य होता है। भाई-बहन के साथ एकोदर अर्थात् एक गर्भाशय में निर्मित शरीरों के रूप में संबंध होना दिखता है। इसी क्रम में प्रत्येक मानव संतान की शरीर रचना में, उसके वैभव में स्वीकृतियाँ बना ही रहता है। हर मित्र संबंध, हर भाई-बहन के सम्बन्ध में शरीर संबंध का स्वरूप कहे गये स्वरूप में ही स्वीकृत रहता है। पति-पत्नी संबंध प्रधानत: गर्भाशय में शरीर रचना कार्य प्रवृत्ति ही होना पाया जाता है। इसी के साथ यौवन सम्पन्नता सहित यौन विचार से होने वाली आवेश मुक्ति के क्रियाकलाप को भी शरीर सम्बन्ध में पहचाना गया है। इस प्रकार शरीर सम्बन्ध का अर्थ विवाह सम्बन्ध से इंगित होने वाला बात स्पष्ट है। यह सामान्य रूप में मानवेत्तर प्रकृति और मानव से निर्मित वातावरणों का निरीक्षण विधि से भी