उन्नति :-
- समृद्धि प्रधान समाधान सहज अपेक्षा, प्रक्रिया एवं प्रमाण।
- जागृति और उसकी निरंतरता की ओर गति।
बहन :- एकोदरीय (एक पेट से पैदा होने वाली) अथवा एकोदरवत् बहनें होती हैं। यह सम्बन्ध निरंतर, विकास के लिए प्रेरक है। मानव के संबंध में उन्नति शब्द का तात्पर्य जागृति और उसकी निरंतरता से है। यही परस्परता में, से, के लिए प्रेरक होना पाया जाता है। प्रत्येक बहिन का, भाइयों से सभी ओर श्रेष्ठता की अपेक्षा बनी रहती है। मनुष्य सहज रूप में बल, बुद्धि, रूप, पद, धन, सम्पदा के रूप में विदित है। इनमें श्रेष्ठता की कामना, सभी सम्बन्धों की परस्परता में, प्रत्याशा के रूप में, देखी जाती है। साथ ही सच्चरित्रता, व्यवहार में सामाजिक, सच्चरित्र मानवीयता पूर्ण आचरण, व्यवसाय में स्वावलम्बी अथवा समृद्धि की अपेक्षा, हर भाई बहिन के सम्बन्ध में, सहज रूप में देखने को मिलती है। इस प्रकार यह सम्बन्ध परस्पर विकास व उन्नति का प्रेरक और सहायक होना सहज है। - म.वि. 85, 86
मित्र :- सहोदरवत् (सगे भाई जैसा ) जो होते हैं, उन्हें मित्र सम्बंध का सम्बोधन है।
भाई-भाई, भाई-बहन, बहन-बहनों के बीच उनके सम्बन्ध और परस्पर परीक्षण कार्यकलाप जागृतिगामी दिशा, व्यवहार और कार्यप्रणाली के साथ गतिशील होता है। यही परस्पर पूरकता विधि को प्रमाणित करता है। इसका स्रोत मानवीयतापूर्ण शिक्षा-संस्कार परंपरा ही है। बाल्यावस्था से ही घर परिवार, शिक्षण संस्थाओं में मानवीयतापूर्ण शिक्षा-संस्कार सुलभ होना सहज रहता ही है। इसके फलस्वरूप प्राप्त शिक्षा-संस्कार और कल्पनाशीलता-कर्म स्वतंत्रता के योगफल में मुखरण होना स्वाभाविक क्रिया है। मुखरण होने का तात्पर्य हर विद्यार्थी अपने-अपने ढंग से प्रकाशित-संप्रेषित होना ही है।
प्रत्येक जीवन, मानव पंरपरा में जागृति और जागृतिपूर्ण होने और प्रमाणित होने के उद्देश्य से ही इस शरीर को जीवन्त बनाए रखने, शरीर संवेदना का दृष्टा होने के अर्हता सहित शरीर यात्रा को आरंभ करता है।
मित्र-मित्र सम्बन्ध - जीवन ज्ञान सम्पन्नता के अनन्तर सुस्पष्ट हो जाता है कि सभी सम्बन्ध जीवन जागृति और उसका प्रमाणीकरण प्रणाली का ही पहचान है। जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान सम्पन्न होने के उपरान्त सम्पूर्ण प्रकार के सम्बन्धों, मूल्यों, मूल्यांकनों और उभयतृप्ति का पहचान, स्वीकृति मानसिकता, गति, प्रयोजन पुन: पहचान, मूल्यांकन क्रम आवर्तित रहता ही है। यह अनुस्यूत प्रक्रिया है। जीवन ही दृष्टा-कर्ता-भोक्ता होने का तथ्य जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान में पारंगत होने के फलन में सह-अस्तित्व में वर्तमानित रहता है। इसी आधार पर मित्र सम्बन्ध परस्पर अभ्युदय के लिये कामना, कार्य, मूल्यांकन करने में समर्थ रहता ही है। मित्र सम्बन्ध में भाई-भाई, बहन-बहन सम्बन्ध