के सदृश जाँच, पड़ताल, विश्लेषण, निष्कर्ष, मूल्यांकन सहायक होना पाया जाता है। दूसरे भाषा में सहायक होना ही सार्थकता है।
हर सम्बन्ध कम से कम दो व्यक्तियों के बीच होना पाया जाता है। भाई और मित्र सम्बन्ध में समानता है। इसको आमूलत: विश्लेषण करने पर लड़कों के साथ लड़कों की मित्रता, लड़कियों की मित्रता लड़कियों से हो पाता है। क्योंकि आशय बहिन-बहिन और भाई-भाई का ही सम्बन्ध है। इस सम्बन्ध का पावन रूप उभय जागृति, कर्तव्य, दायित्व उसकी गति प्रयोजन और उसका मूल्यांकन विधि से ही मित्रता और भाई-बहन सम्बन्ध सदा-सदा ही मानव परंपरा में पावन रूप में उपकार विधि और उसका शोध, निष्कर्ष को प्रस्तुत करते ही रहेंगे। पावन का तात्पर्य व्यवस्था के अर्थ में है। यही उपकार का स्वरूप है। यद्यपि सभी सम्बन्धों में आशित, इच्छित, लक्षित और वांछित तथ्य समाधान, समृद्घि अभय, सह-अस्तित्व ही है। इस आशय अथवा आवश्यकता की आपूर्ति और इसके सर्वसुलभ होने के लिये समझना-समझाना, करना-कराना, सीखना-सीखाना स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसी क्रम में समाज गति, व्यवस्था, व्यवस्था में भागीदारी, स्वाभाविक रूप में मूल्यांकित होता है। ऐसे मूल्यांकन प्रणाली से ही मानव परंपरा में मानवीयतापूर्ण प्रणाली, पद्घति, नीति का दृढ़ता सुखद, सुन्दर, समाधान, समृद्घिपूर्वक प्रमाणित होना नित्य समीचीन रहता है। ऐसे सर्ववांछित उपलब्धि के लिये मित्र संबंध अतिवांछनीय होना पाया जाता है।
समाधान, समृद्धि सहज समानता ही मित्र संबंध है एवं सर्वतोमुखी समाधान में सहभागिता हो उसकी ‘मित्र’ संज्ञा है।
जिसमें बैर का अभाव हो उसकी मित्र संज्ञा है।
दोनों पक्ष की समृद्धि में चाहे कितना अन्तर हो, मैत्री की परस्परता में अनिष्ट चिन्तन का स्थान नहीं है। इस सम्बन्ध में यह आवश्यक है कि संपन्न या असम्पन्न पक्ष यदि किसी विपरीत घटना या परिस्थिति से घिर जाए तो दूसरा पक्ष अपना पूरा तन, मन, और धन व्यय करने के लिए तथा मित्र को उस घटना-विशेष अथवा परिस्थिति विशेष से उभारने के लिये प्रयत्नशील हो जाय। यही मित्रता की चरम उपलब्धि है। घटना ग्रस्त या परिस्थिति ग्रस्त मित्र की जो कठिनाइयाँ हैं, वह पूरी की पूरी दूसरे मित्र को प्रतिभासित होती है। मित्रता की कसौटी ही यह है कि परस्पर की कठिनाइयों को दूसरा पक्ष अधिक स्वीकार लेता है और यदि उसका परिहार है, तो उसके लिये अपनी शक्तियों की नियोजित करता है।
ऐसी मित्रता की निरंतरता न्याय पूर्ण व्यवहार सम्बन्ध से ही सफल होती है। निर्वाह के इन समस्त सम्बन्धों से व्यष्टि से समष्टि तक पोषण अन्यथा शोषक सिद्ध है। -व्य.द., 1978, 162
मित्रता की निरंतरता न्याय पूर्ण व्यवहार से ही सफल होती है। निर्वाह के इन समस्त सम्बन्धों से व्यष्टि से समष्टि तक पोषक अन्यथा शोषक सिद्ध है। मित्र-मित्र सम्बन्ध की परस्परता में विश्वास, सम्मान व स्नेह मूल्य प्रधान है एवं प्रेम संबंध भावी रहता है। - व्य.द. 126