शरीर सम्बन्ध विवाह विधि से होने वाला तथ्य इंगित रहता ही है। इसीलिये इसके लिये अलग से कोई शिक्षा प्रदान करने की आवश्यकता नहीं रह जाता।
दाम्पत्य जीवन की चरमोपलब्धि ‘एक ही मन ओर दो शरीर होकर’ व्यवहार करना है। दाम्पत्य जीवन में व्यवहार निर्वाह सम्पर्क एवम् सम्बन्ध ही है। तात्पर्य यह है कि दाम्पत्य जीवन व्यक्ति के रूप में दो है और व्यवहार के रूप में एक है।
पति-पत्नी दोनों में से किसी के द्वारा भी अज्ञान के कारण कितने भी अंश में इस प्रतिज्ञा - ‘एक मन ओर दो शरीर होकर जिएंगे’ – का निर्वाह नहीं किया जाता या जितने अंश में उक्त प्रतिज्ञा का उल्लंधन किया जाता है, उतना ही दोनों पक्ष अपनी २ पूर्व-धारणाओं के कारण उत्पीड़ित हो जाते हैं। इसका फल होता है कि दो विचारधारा के अनुरूप दो व्यवहारधारा आरंभ हो जाती है। परस्पर विश्वास की कमी के फलस्वरूप कुछ अवधि तथा आयु के पश्चात् दोनों अपने को अलग-अलग अनुभव करने लगते हैं। इसके मूल में कारण यही होता है कि उसमें से प्रत्येक यह अनुभव करता है कि उसके द्वारा मूल-भूत विश्वास का निर्वाह नहीं किया जा सका।
ऐसा एक मन और दो शरीर वाला जीवन जीने या अनुभव करने के लिये, दोनों पक्षों के लिये यह आवश्यक है कि सम्बन्धात्मक तथा सम्पर्कात्मक व्यवहारों का निर्वाह करने में अपनी आर्थिक तथा मानसिक प्रयुक्तियाँ किस अनुपात एवम् रीति नीति से नियोजित करेंगे, इसका निर्णय पूर्व में ही कर लेवें और इसके पश्चात् ही उन प्रयुक्तियों से वांछित सुख एवं आह्लाद का अनुभव होगा, जो सम्बन्ध एवम् सम्पर्क का निर्वाह करने पर या पूर्णतया निर्वाह करने पर हर व्यक्ति से प्राप्त होता है। मूलतः दोनों पक्षों द्वारा निर्विरोधपूर्वक अपने सम्बन्ध एवम् सम्पर्क का निर्वाह करना ही अवसर, आवश्यकता तथा उपलब्धि है। जहाँ तक मान, सम्मान, प्रतिष्ठा, आदर और यश का प्रश्न है, वह पति अथवा पत्नी दोनों में सम्मिलित रूप से रहता है तथा उनमें से किसी एक को भी मिलने पर दूसरे पक्ष में वह समान रूप से बँटता ही है। व्य.द. १९७८, १५७
पति-पत्नी संबंध में परस्परता में मूल्यों का पहचान इस प्रकार से होता है कि विश्वास पूर्वक सम्मान, स्नेह व प्रेम मूल्यों का निरंतर अनुभव होता है या समय-समय पर होता है। न्यूनतम विश्वास मूल्य बना ही रहता है। प्रेम मूल्य; दया, कृपा, करुणा की अभिव्यक्ति है। इस विधा में पति में मूल्यांकन के आधार पर दया, कृपा, करुणा मूल्यों का स्पष्ट होना, उसी प्रकार से पत्नी द्वारा भी इन मूल्यों का स्पष्ट होना ही प्रेम मूल्य है। वास्तविक रूप में पात्रता के अनुसार वस्तु का मूल्यांकन, पात्रता के अनुसार योग्यता का मूल्यांकन, योग्यता के अनुसार पात्रता का मूल्यांकन परस्परता में होना स्वाभाविक क्रिया है। यह नित्य नैमित्यिक है। नित्य मूल्यांकन का तात्पर्य हम मूल्यांकन में अभ्यस्त हो गये हैं। नैमित्यिक का तात्पर्य-प्रयत्न पूर्वक ध्यान पूर्वक मूल्यांकन करने से है। ऐसी स्थिति बारंबार होते-होते मूल्यांकन सहज रूप से होना पाया जाता है। इस प्रकार योग्यता के अनुसार पात्रता, पात्रता के अनुसार योग्यता का मूल्यांकन विशेषकर पति-पत्नी संबंध में होना अति आवश्यक है। ये दोनों मूल्यांकन के साथ ही पात्रता और योग्यता में संतुलन स्थिति को पाया जाता है। तीसरी विधि से पति या पत्नी अथवा दोनों में योग्यता, पात्रता हो ही नहीं, यह दाम्पत्य जीवन अथवा किसी भी प्रौढ़/युवा में संभव ही नहीं है। यही हो सकता है कि योग्यता और पात्रता का न्यूनातिरेक हो सकता है। इसी में सामंजस्य को पाने के लिए दाम्पत्य जीवन का महती उपयोग होना पाया जाता है। इन तथ्यों को, पूर्व आशयों को भुलावा देना ही दु:ख और परेशानी का कारण है। यही भ्रम है। - व्य.द. १९७८, १५७