स्वनारी/स्वपुरूष की परिभाषा

- विधिवत् विवाह पूर्वक प्राप्त नारी या पुरूष।

व्याख्या :- इस मुद्दे पर अनेक समुदाय परम्पराएँ विविध प्रकार से विवाह कार्य को सम्पन्न करते हैं। इसका पार्थिव या दैहिक प्रयोजन शरीर सम्बन्ध ही होना, ऐसे विवाह सम्बन्ध में जुड़े हुए नर-नारियों में प्राप्त, धन का उपभोग करने में समानाधिकार अथवा न्यूनातिरेक अधिकार के रूप में स्वीकृत रहा है। इससे अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था का आधारभूत सूत्र व्याख्या नहीं हो पाया। इसका साक्ष्य अनेक और विविध समुदाय परंपरा ही है।

विवाह सम्बन्ध मूलत: -

  • परिवार व्यवस्था में जीने और समग्र व्यवस्था में भागीदारी निर्वाह करने की प्रतिज्ञा है।
  • विवाह संबंध ‘परिवार मानव’ रूप में व्यवस्था विधि से जीने की कला को स्वीकारने की प्रतिज्ञा है।
  • विवाह सम्बन्ध परिवार में, से, के लिये आवश्यकीय वस्तुओं के लिये अपनाया गया उत्पादन-कार्य में भागीदारी करने की प्रतिज्ञा है।
  • परिवार मानवता सम्पन्न व्यक्ति में ही सम्पूर्ण अथवा मानवीयतापूर्ण प्रतिज्ञाएँ निर्वाह होते हैं। इस विधि से विवाह के पहले हर नर-नारी परिवार मानव के रूप में प्रतिज्ञा स्वीकार करने के लिये ‘स्वायत्त मानव’ के रूप में प्रतिष्ठित रहना, विवाहाधिकार तन, मन, धन का सदुपयोग-सुरक्षा करने में प्रतिज्ञा का आधार है।
  • किसी भी मानव परिवार में, से विवाह सम्बन्ध का योजना मानव कुल के लिये उपयुक्त है। विवाह सम्बन्ध नस्ल या रंग की सीमाओं से विशालता के लिये सहायक होना देखा गया है। इसीलिये विवाह-बेला में नस्ल-रंग से संबंधित विचारों व आग्रहों से मुक्त होने की प्रतिज्ञा है।
  • विवाह सम्बन्ध मानवीयतापूर्ण व्यवहार करने के लिए प्रतिज्ञा है।
  • विवाह सम्बन्ध, सम्बन्ध, मूल्य, मूल्यांकन एवं उभयतृप्ति के लिये कार्य करने में प्रतिज्ञा है।
  • प्रत्येक नर-नारी जो विवाहपूर्वक जीने की कला को प्रमाणित करने के लिये उद्देश्य बना लिये हैं। वे दोनों जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान सम्पन्न होने में पारंगत होने में और मानवीयतापूर्ण आचरण में प्रमाणिक होने का घोषणा करते हुए तन, मन, धन रूपी अर्थ का सदुपयोग और सुरक्षा करने के लिये प्रतिज्ञा करेंगे।

संबंधों के विशालता विधि को ध्यान में रखते हुए विवाह सम्बन्ध में किसी भी मानवीयतापूर्ण परिवार में पले हुए स्वायत्त मानवाधिकार सम्पन्न नर-नारी का विवाह सम्बन्ध घटित होना मानव कुल सहज नैसर्गिक है। इसकी स्वीकृति हर नर-नारी में अवधारणा के रूप में होना आवश्यक है। – स.श. 151-150

  • पति = यतीत्व = यत्न पूर्वक तरने के लिए, जागृति निर्भ्रमता और जागृति सहज निरंतरता के लिए किया गया सम्पूर्ण कार्य-व्यवहार; निर्भ्रमता सहित की गई प्रक्रिया एवं प्रयास।
  • पत्नी = सतीत्व = सत्व अर्थात् संकल्प, निष्ठापूर्वक समझना ही तरना। – म.वि. 100
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