7. व्यवस्था सम्बन्ध

(व्यवस्था संबंध = समग्र व्यवस्था में भागीदारी = राज्य* एवं नागरिक* सम्बन्ध )

राज्य की उपयोगिता विधि तथा व्यवस्था द्वारा जन-जाति के विकास एवम् समृद्धि को बनाए रखने में है। राज्य की इस उपादेयता के प्रति जीवन के प्रत्येक पक्ष में अनवरत गौरव को स्वीकारना ही सभ्य नागरिक* का लक्षण है। साथ ही राज्य का जो मूल उद्देश्य विकास और समृद्धि है, उसके लिये अंगभूत मनुष्य का अपने जीवन के कार्यकलापों को बनाए रखना ही उसके द्वारा एक सभ्य नागरिक के रूप में राज्य के साथ सम्बन्ध निर्वाह है। - व्य.द. (1978) 162 (*पुस्तक में ‘राज्य’ के स्थान पर 'शासन' एवं ‘नागरिक’ के स्थान पर ‘प्रजा’ शब्द के प्रयोग किये गए हैं)

व्यवस्था में जीने का प्रमाण परिवार में होता है। समग्र व्यवस्था में भागीदारी सहज क्रम में व्यवस्था संबंध को पहचानने की आवश्यकता उत्पन्न होती है। जैसा परिवार में न्याय-सुरक्षा का प्रमाण संबंध, मूल्य, मूल्यांकन तन, मन, धन का सदुपयोग-सुरक्षा विधि से प्रमाणित हो जाता है। यही परिवार मानव का मानवीयतापूर्ण परिवार का परिभाषा है। इसीलिये परिवार में परस्पर हुई पिता-पुत्र, भाई-बहन, मित्र, गुरू, शिष्य, पति-पत्नि, माता-पिता इन संबंधों में संबोधन सहज संबध चिन्हित होता है और उत्पादन-कार्य में भागीदारी प्रमाणित रहता ही है। हर परिवार में वस्तुओं का उपयोग, सदुपयोग भी साक्षित रहता है। विनिमय-कार्य के लिये और विशाल संबंध की आवश्यकता बनी रहती है। एक परिवार की आवश्यकता जितने प्रकार की वस्तुओं की बनी रहती है उनमें से कुछ वस्तुओं को किसी भी परिवार में उत्पादित होना स्वाभाविक है विनिमयपूर्वक एक परिवार में उत्पन्न वस्तु को दूसरे परिवार प्राप्त कर लेना ही वस्तुओं का आदान-प्रदान का तात्पर्य है। इस विधि से विनिमय एक आवश्यकीय क्रियाकलाप है; यह स्पष्ट हो जाता है। व्यवस्था के आयामों में विनिमय एक आयाम है। व्यवस्था रूप में ही संपूर्ण आयाम सहित परंपरा स्पष्ट होती है यथा मानवीयतापूर्ण शिक्षा-संस्कार परंपरा अन्य सभी चार आयामों के लिये स्त्रोत और संतुलन सूत्र होना पाया जाता है। – स.श. 235-236

मानवत्व सहित व्यवस्था में विधि समायी रहती है। विधान निर्वाह रूप में प्रमाणित होता है। व्यवस्था का धारक-वाहक जागृत मानव ही होता है। व्यवस्था में भागीदारी करने के लिए मानव को जागृत होना रहना आवश्यक है। जागृति पूर्वक ही हर नर-नारी जानने, मानने, पहचानने, निर्वाह करने का प्रमाण प्रस्तुत करता है।

सामाजिक दायित्व का प्रमाण हर समझदार परिवार में समाधान, समृद्धिपूर्वक जीने में प्रमाणित होता है। यह क्रमशः सम्पूर्ण मानव का एक इकाई के रूप में पहचान पाना बन जाता है। पहचानने के फलन में निर्वाह करना बनता ही है। ऐसी निर्वाह विधि स्वाभाविक रूप में मूल्यों से अनुबंधित रहता ही है। यही व्यवस्था में भागीदारी की स्थिति में परिवार व्यवस्था से अन्तर्राष्ट्रीय या विश्व परिवार व्यवस्था तक स्थितियों में भागीदारी की आवश्यकता रहता ही है। ऐसे भागीदारी के क्रम में मानव अपने में, से समझदारी विधि से प्रस्तुत होना बनता है। समझदारी विधि से ही हर नर-नारी व्यवस्था में भागीदारी करना सुलभ सहज और आवश्यक है। इसी क्रम से मानव लक्ष्य प्रमाणित होते हैं जो समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व के रूप में पहचाना गया है, इसे प्रमाणित करना ही मानवीयता पूर्ण व्यवस्था है। - व्य.द. 126-127

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