मानव परम्परा में सम्पूर्ण प्रयोजन “व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी’’ के रूप में “परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था’’ ही है, जिसका लक्षण समाधान, समृद्घि, अभय तथा सह-अस्तित्व ही है। यही सर्व मानव स्वीकृति है।
प्रत्येक मनुष्य व्यवस्था को वरता है (अथवा व्यवस्था में जीना चाहता है)। इस आशय की सार्वभौमता को, अध्ययन गम्य कराना मानव परम्परा का ही प्रधान कार्य है। शिक्षा पूर्वक ही सम्पूर्ण अवधारणाएं स्थापित हो पाती हैं। प्रचार, व्यवहार, व्यवस्था पूर्वक, पुष्ट होते हैं। मानव अभी तक अपनी संचेतना के प्रति जागृत होने के क्रम में ही है। संभावनाएं समीचीन हैं ही। – म.वि. 53
संबंधों को प्रयोजन के अर्थ में पहचानने से मूल्य अपने आप बहते हैं। प्रयोजन = समाधान, समृद्धि, अभय, सह-अस्तित्व, जीवन जागृति, अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था ही है। - संवाद, २००७
मानवीय चेतना संपन्न मानव संबंध में स्थापित व शिष्ट मूल्य निम्न है। सभी संबंधों का निर्वाह ही व्यवस्था है। - विकल्प, 22; म.वि. 136
1. विश्वास 2. सौजन्यता
विश्वास :-
परस्परता में निहित मूल्य निर्वाह।
- व्यवस्था की समझ, समाधान की अभिव्यक्ति और संप्रेषणा।
- संबंध निर्वाह निरंतरता सहित मूल्यों के निर्वाह की निरंतरता
- सौजन्यता
सहकारिता, सहभागिता, सहयोगिता, पूरकता।
- परस्पर पूरकता ही सौजन्यता है।
- पूरकता विधि से ही विश्वास सहज प्रमाण संपन्न होता है। पूरकता हर परस्परता में समीचीन है। मानव सहज परस्परता, नैसर्गिकता सहज परस्परता नित्य विद्यमान है। – म.वि. 43
विश्वास एक साम्य मूल्य है। सम्पूर्ण सम्बंधों में, सहज विश्वास ही, वर्तमान में सुख पाने की विधि है। – म.वि. 46-47
प्रत्येक मानव, विश्वास पूर्वक जीना ही चाहता है। विश्वास को मूल्यों के क्रम में जानना, मानना, सम्बंधों को पहचानना व निर्वाह करना सरल, सुंदर, समाधान और इसकी निरंतरता है। इसका प्रमाण - शिशु काल में प्रत्येक मानव संतान,