मानवीय विषय:

पुत्रेषणा, वित्तेषणा एवं लोकेषणा मानवीय विषय है।

वित्तेषणा:- सदुपयोग के अर्थ में न्याय दृष्टि पूर्वक धन बल कामना ही वित्तेषणा है। धन: आहार, आवास, अलंकार, दूरश्रवण, दूरगमन, दूरदर्शन संबंधी वस्तुएँ।

  • पुत्रेषणा: - परिवार एवं समाज व्यवस्था के अर्थ में जन-बल कामना एवं वंश वृद्धि में विश्वास (वंश संरक्षण विचार) की पुत्रेषणा संज्ञा है।
  • लोकेषणा:- अखण्ड समाज व्यवस्था के अर्थ में न्याय, धर्म दृष्टि पूर्वक यश-बल कामना ही लोकेषणा है।
  • मानवीय स्वभाव:

धीरता, वीरता, और उदारता ही मानवीय स्वभाव है।

धीरता: - न्याय के प्रति निष्ठा एवं दृढ़ता ही धीरता है।

  • वीरता: - दूसरों को न्याय उपलब्ध कराने में अपने बौद्धिक एवं भौतिक शक्तियों को नियोजित करने की प्रवृत्ति ही वीरता है।
  • उदारता: - अपनी सुख सुविधाओं को अर्थात् तन, मन, धन को प्रसन्नता पूर्वक दूसरों के लिए उपयोगिता, सदुपयोगिता विधि से नियोजित करने की प्रवृत्ति ही उदारता है।
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(C) अतिमानवीयता

अतिमानवीय स्वभाव, विषय एवं दृष्टि की जागृति के लिए समुचित अवसर एवं साधन को नियोजित करने वाली व्यवस्था एवं वैयक्तिक प्रयास को अतिमानवीय सामाजिक व्यवस्था कहते हैं. अखंड समाज, परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था व हर मानव सहज प्रमाण परंपरा ही अतिमानवीय सामाजिक व्यवस्था है।

अतिमानवीय दृष्टि:

मात्र सत्य

अतिमानवीय विषय:

  • सत्य (सह-अस्तित्व रूपी परम सत्य)
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