ऊपर कहे गये मानव मूल्यों में से धीरता, वीरता, उदारता को स्वयं निरीक्षण करना एक सहज कार्य और उपलब्धि के रूप में देखा गया है। इसके लिए जीवन तंत्रणा के संबंध में एक संक्षिप्त और स्पष्ट झांकी मानव के सम्मुख प्रस्तुत हो चुकी है जिसमें जीवन के दसों कार्यकलापों को स्पष्ट किया है। यहाँ जीवन का मूल स्वरूप और रचना संबंधी तत्व को सूक्ष्म रूप में इंगित कराया है इसका विशद् अध्ययन ‘अस्तित्व में परमाणु का विकास’ में किया गया है। – अ.श. 42-48
पहले धीरता, वीरता, उदारता का स्वरूप स्पष्ट किया जा चुका है। मानव मूल्य के रूप में दया, कृपा, करुणा, जीवन जागृति पूर्णता का प्रमाण रूप में अथवा साक्ष्य रूप में व्यवहृत होना पाया जाता है।
दया
- पात्रता के अनुरूप वस्तु, योग्यता प्रदायी क्षमता (म.वि. 120)
प्रत्येक मनुष्य शांति व उत्सवपूर्वक, दयापूर्ण कार्य-व्यवहार को सम्पन्न करने में समर्थ होता है। दया का मुख्य कार्य विकास क्रम और जागृति सहज यथा स्थिति को बनाए रखना है। यही जीने देना ही दया है। जीने देने का तात्पर्य भी, जो जैसा है, उसको उसी विकास के बिंदु में सुरक्षित करना है। दया की दूसरी स्थिति और कार्य-अविकसित के विकास में सहायक होना है। इस प्रकार से दोनों कार्य शांति पूर्वक ही सम्पन्न होना मनुष्य में प्रमाणित है। जो लोग अभी तक इस प्रकार के कार्यों को करने में सफल हुए हैं, वे सब शांति सहज जीवन को जिए हैं। - म.वि. 123
(इस ढंग से) दया को मानव के आचरण में जीने देकर स्वयं जीने के रूप में देखा गया है। जीने देने के क्रम में पात्रता के अनुरूप शिक्षा-संस्कार को सुलभ कर देना, प्रमाणित होता है। दूसरे विधि से पात्रता के अनुरूप वस्तुओं को सहज सुलभ करा देने के रूप में स्पष्ट होता है। - अ.श. 49–50
कृपा
- वस्तु के अनुरूप योग्यता, पात्रता उपलब्ध कराने वाली क्षमता
कृपा का व्यवहार रूप प्राप्त वस्तु के अनुरूप योग्यता को स्थापित करने के रूप में है। उदाहरण के रूप में मानव है, मानव एक वस्तु है, मानव में मानवत्व सहित व्यवस्था के रूप में जीने की योग्यता को स्थापित कर देना ही कृपा सहज तात्पर्य है।
करुणा
- विकास के लिए उत्प्रेरित करना। पात्रता, योग्यता और वस्तु उपलब्ध कराने में सहायक होना ।
करुणा का तात्पर्य पात्रता के अनुरूप वस्तु; वस्तु के अनुरूप योग्यता को स्थापित करने के रूप में देखा जाता है। यह मूलत: मानव में उदारता और दया, देवमानव में दया और कृपा; दिव्यमानव में दया, कृपा, करुणा प्रधान रूप में, व्यवहृत होने की अर्हता प्रमाणित हो पाती है। ऐसे परिवार मानव, देव मानव, दिव्य मानव के रूप में समृद्घ होने योग्य