अमानवीय स्वभाव, विषय एवं दृष्टि का संरक्षण, संवर्धन एवं प्रोत्साहन देने हेतु की गई व्यवस्था अमानवीय अथवा पाशविक व्यवस्था है। (अमानवीय प्रवृत्तियों का वर्णन पूर्व में 3.3, ‘जीवन में जागृतिक्रम’ के अंतर्गत किया गया है)
अमानवीय दृष्टि:
प्रियाप्रिय, हिताहित एवं लाभालाभ ही अमानवीय दृष्टि है।.
- प्रिय: - इंद्रिय सुख अपेक्षा क्रिया की प्रिय संज्ञा है।
- हित: - शरीर स्वास्थ्य वर्धन एवं पोषण क्रिया की हित संज्ञा है।
- लाभ: - श्रम से अधिक द्रव्य पाने की क्रिया को लाभ अथवा लघु मूल्य के बदले गुरु-मूल्य आदाय ही लाभ है।
- प्रियाप्रिय विषय सापेक्ष, हिताहित शरीर सापेक्ष, लाभालाभ वस्तु व सेवा सापेक्ष पद्धति से स्पष्ट होता है I
अमानवीय विषय:
आहार, निद्रा, भय एवं मैथुन ही अमानवीय विषय है।
- आहार: शरीर पुष्टि हेतु अन्न का सेवन
- निद्रा: शरीर का संचालक (चैतन्य क्रिया) संचालन क्रिया को रोकता है या कम करता है तब शरीर निद्रा में रत होता है। निद्रा जड़ का स्वाभाविक गुण है।
- भय:
- प्राकृतिक भय, पाश्वीय भय, मानव में निहित अमानवीयता का भय
- अमानवीय मूल प्रवृत्तियों का स्व पर प्रभाव। संदिग्धता, सशंकता एवं विरोध ही भय है।
- प्राण भय, मान भय, धन भय, पद भय
- मैथुन: यौवन क्रिया।
- अमानवीय स्वभाव:
हीनता, दीनता, एवं क्रूरता ही अमानवीय स्वभाव है।
दीनता: - अपने दुःख को दूसरों से दूर कराने हेतु जो आश्रय प्रवृत्ति है, उसकी दीनता संज्ञा है।
दीनता अभावजन्य या अक्षमताजन्य दो प्रकार की होती है।