(ii) स्वनारी/स्वपुरूष का प्रयोजन इस विधि और आधार से देखा गया है कि समाज रचना क्रम में एक नारी-पुरूष का शरीर संयोग मानव शरीर रचना अथवा संतान परंपरा के लिए आवश्यकता विधि से सहज कार्यकलाप विधि से भी आवश्यक घटना है। शरीर रचना विधि से यौवन ही इसका आधार है। कार्य विधि से मानव परंपरा बना रहना एक आवश्यकता है। प्रयोजन विधि से व्यवस्था में जीना एक अनिवार्यता है। व्यवस्था का तात्पर्य न्याय सुलभता, उत्पादन सुलभता, विनिमय सुलभता ही है जिसका स्रोत मानवीयतापूर्ण शिक्षा-संस्कार और स्वास्थ्य-संयम कार्यकलाप ही है। इसी से परिवार परंपरा होना भी सहज है।
(iii) दयापूर्ण कार्य-व्यवहार का स्वरूप आवश्यकतानुसार (अपने-पराये के दीवाल विहीन विधि से) अर्थ का सदुपयोग कार्य ही है। यह विशेषकर कर्तव्य और दया सूत्र सम्पन्न परिवार संबंधों में जुड़े होते हैं। जागृति सम्पन्न सर्व परिवार, सर्व मानव के साथ दया का प्रभाव क्षेत्र बना रहता है। हर परिवार समृद्घ होने और समाधानित रहने के आधार पर दयापूर्ण कार्य-व्यवहार सार्थक होना देखा गया है। दयापूर्ण कार्य-व्यवहार की सम्पूर्ण अभिव्यक्ति समग्र व्यवस्था में भागीदारी का ही स्वरूप है। इतना ही नहीं व्यवस्था स्रोत सहित व्यवस्था में भागीदारी का स्वरूप है। इस प्रकार दयापूर्ण कार्य-व्यवहार का कार्य सार्थकता और उसकी अनिवार्यता स्पष्ट होती है। मूलत: यह सब अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था के लक्ष्य में प्रतिपादित और प्रवर्तित है। इसका दृष्टफल मानवापेक्षा रूपी समाधान, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व है। यह अनुभव मूलक प्रणाली से ही हर मानव में सार्थक होना पाया जाता है। अस्तु, मानवीयतापूर्ण आचरण सह-अस्तित्व में अनुभव मूलक विधि से और जीवन ज्ञान सहित ही अखण्ड समाज-सार्वभौम व्यवस्था सम्पन्न होना देखा गया है जो स्वयं में स्रोत के रूप में होना पाया जाता है। – अ.द. 48-49
4.6 पञ्च कोटि के मानव: दृष्टि, विषय, स्वभाव; मानव मूल्य
स्वभाव गति सदा-सदा ‘त्व’ सहित व्यवस्था के रूप में दृष्टव्य है। स्वभाव गति का तात्पर्य इस बात को भी इंगित करता है कि स्वभाव-धर्म के अनुरूप गति। यही हरेक इकाई में अन्तर सामरस्यता का भी द्योतक है। फलस्वरूप परस्परता में व्यवस्था प्रमाणित होना सहज है। मानव का स्वभाव मानवीयता और उसमें परम श्रेष्ठता के आधार पर धीरता, वीरता, उदारता, दया, कृपा, करुणापूर्ण कार्य-व्यवहार, विचार व अनुभव ही है। यही प्रतिष्ठा मुख्य रूप से दृष्टा पद का द्योतक है। दृष्टा पद परिपूर्ण समझदारी का ही अभिव्यक्ति संप्रेषणा व प्रकाशन है। ऐसी समझदारी का स्वरूप जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान है। यही दृष्टा पद जागृति का सम्पूर्ण अधिकार स्वरूप भी है। इस प्रकार सम्पूर्ण समझदारी का अधिकार सम्पन्न दृष्टा होना देखा गया है। इसी समझदारी में से जीवन ज्ञान के साथ निष्ठा, अस्तित्व दर्शन के साथ निश्चयता और मानवीयतापूर्ण आचरण की अभिव्यक्ति में दृढ़ता पूर्वक व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी प्रमाणित होना सहज है। इस विधि से हर मानव दृष्टा, कर्ता और भोक्ता होना पाया जाता है। - आ.व. 195–196