जीवन अपेक्षा को सुख, शान्ति, संतोष, आनन्द के रूप में पहचाना गया है। सुख को समाधान की अनुभूति एवं स्वीकृति के रूप में पहचाना गया है। समाधान, समृद्धि की संयुक्त अनुभूति एवं स्वीकृति शान्ति का स्रोत और स्वरूप होना पाया जाता है। समाधान, समृद्धि, अभय (वर्तमान में विश्वास) के योगफल की अनुभूति एवं स्वीकृति को संतोष के रूप में पाया जाता है।
समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व की संयुक्त अनुभूति आनन्द के रूप में सुस्पष्ट है। जीवन आकांक्षा और मानव आकांक्षा यह परस्परता में पूरक होना पाया जाता है।
सहअस्तित्ववादी नजरिया से यह स्पष्ट होता है सुखी होने के लिए समाधान अपरिहार्य है। सुख को मानव के धर्म के रूप में पहचाना गया है। मानव ज्ञानावस्था की इकाई होने के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है। ज्ञान ही विज्ञान और विवेक के रूप में प्रमाणित होना पाया गया है। विवेक की सार्थकता लक्ष्य को पहचानने के रूप में, विज्ञान की सार्थकता को जीवन लक्ष्य मानव लक्ष्य के लिए दिशा और प्रक्रिया को स्पष्ट करने के रूप में और स्पष्ट हाने के रूप में, साथ ही प्रमाणित होने के रूप में पहचाना गया है। इसे हर व्यक्ति पहचान सकता है प्रमाणित हो सकता है। इसके लिए चेतना विकास मूल्य शिक्षा प्रस्तुत है।
सदा से मानव सुखी होने के लिए इच्छुक प्रयत्नशील रहा ही है। यत्न प्रयत्नों में सोचने समझने की आकांक्षा समाहित रही ही है। साथ में इनके फल परिणामों को आंकलित करते आया है।
यह सभी प्रक्रियाएँ मानव के सुखधर्मी होने के प्रमाण में गण्य हैं। मानव का सुख धर्मी होना सर्वमानव में दृष्टव्य है। मानव सुखधर्मी होना मानव परम्परा में, से, के लिए सौभाग्य है। क्योंकि सुखी होने के लिए व्यवहार व प्रयोग करना स्वाभाविक है। इसी क्रम में सही गलत होती रही। सही को मानव स्वीकारता आया। सहीपन को संवदेनशीलता में अनुकूलता प्रतिकूलता के रूप में पहचानते आया, यह प्रक्रिया और शोध हर मानव में होता आया।
अनुकूलता में सुख भासना दूसरा सौभाग्य रहा। क्योंकि सुख भासने के आधार पर ही सुख की निरन्तरता की अपेक्षा, कल्पना और प्रयोग होना स्वाभाविक रहा।
जिसके आधार पर प्रमाणों का लोक-व्यापीकरण उदय होता आया। इस प्रकार मानव के अपने सौभाग्य को पहचानने, प्रयोजनशील होने, प्रमाणित होने और प्रमाण परम्परा बनाने की सीढ़ियाँ अपने आप से लगी हैं। यह सब मानव प्रवृत्ति की सहज सीढ़ी है। इस क्रम में मानव, (हर नर-नारी) अपने प्रयासों को बनाए रखना देखा जा रहा है। इसी क्रम में संवदेनशीलता के अनुकूलता के मुद्दे में पराकाष्ठा यानि व्यसन में मनमानी पर पहुँचने के उपरान्त भी सुख की निरन्तरता का रास्ता अभी तक तय हो नहीं पाया। व्यवहारात्मक जनवाद दिशा निर्धारित करने के पक्ष में प्रस्तुत है। सुख अर्थात् समाधान का अनुभव होना पहले जिक्र किया गया है।
मानव ही अनुभव योग्य इकाई है। जीवों में संवदेनाओं की स्वीकृति होना और संवदेनाओं के विरोध को नकारते हुआ देखा जाता है। मानव भी ऐसा ही करता है। संवेदनाओं से जो सुख भासने का मुद्दा है वह मानव में ही होता है। क्योंकि