पारंगत होने से है। मानवीयतापूर्ण आचरण हर विद्यार्थी में, से, के लिये सुलभ होने से है। सह-अस्तित्व ही परम सत्य होने के कारण अस्तित्व में अनुभव होने के क्रियाकलाप को ‘‘अनुभवात्मक अध्यात्म वाद’’ नाम दिया है। इस तरीके से हम सहज ही इस निष्कर्ष में आ सकते हैं कि हर व्यक्ति के जागृत होने की संभावना समीचीन है। - आ.व. 158-164

परिवार मानव पद में ही मानवीयतापूर्ण आचरण सार्थक हो पाता है। परिवार में न्याय सार्थकता प्रमाणित रहता ही है। इसी आधार पर अर्थात् परिवार मानव ही व्यवस्था मानव होने के आधार पर बंधनमुक्ति के प्रमाण स्पष्ट हो जाते हैं। न्याय सुलभता से स्वाभाविक रूप में आशा बन्धन से मुक्ति स्वाभाविक है। इससे पता चलता है न्याय प्रदायी योग्यता का विकसित होना ही आशा बन्धन से मुक्ति का गवाही है। शरीर या मोह से ही मानव संपूर्ण प्रकार के अन्याय और कुकर्म करता है। इसे हर मानव, हर स्थिति में आंकलित कर सकता है। परिवार मानव विधि से हर काल, हर परिस्थिति में (मानवीयता पूर्ण परिस्थिति में) न्याय प्रदायी योग्यता और क्षमता को प्रमाणित करना सहज है। यही प्रधान रूप में मुक्ति का प्रमाण है। ऐसी परिवार मानव के रूप में जीने की सम्पूर्ण चित्रण स्वयं में समाज रचना का चित्रण है।

जागृतिपूर्वक ही हर व्यक्ति प्रमाणित होना पाया जाता है। जागृति को अभिव्यक्ति क्रम में जागृति और जागृतिपूर्णता नाम दिया है। मानव व्यवस्था में जागृत होने से व्यवस्था के रूप में जीना प्रमाणित हो पाता है। इसी पद को अर्थात् जागृत पद क्रिया-पूर्णता है। क्रियापूर्णता का तात्पर्य भी मानवीयतापूर्ण विधि से करने योग्य सभी कार्य सम्पन्न होने की विधि से है। यह कायिक, वाचिक, मानसिक, कृत कारित अनुमोदित विधि से होना पाया गया है। यही मानव सहज जागृति का विस्तार का भी द्योतक है। इन्हीं आधारों के महिमा को क्रियापूर्णता से इंगित किया है। न्याय और व्यवस्था में जीना ही इसका सार्थकता है। फलस्वरूप व्यवस्था की सार्वभौमता मानव सहज समाज में अखण्डता सूत्रित, व्याख्यायित, वैभवित हो पाती है। ऐसे अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था के स्रोत रूप में कार्य करने वाला मानव को देव मानव, दिव्य मानव कहा है। यह विचार बंधन से मुक्ति का स्वरूप है। इनमें से दिव्य मानव आचरणपूर्णता को प्रमाणित करना देखा गया है। इसी पद को जागृतिपूर्णता नाम दिया है। इनके कार्यरूप को अखण्ड समाज और सार्वभौम व्यवस्था का स्रोत सहित जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन, मानवीयतापूर्ण आचरण में प्रमाण के रूप में होना पाया जाता है जागृतिपूर्णता ही प्रमाण का आधार है। हर व्यक्ति प्रमाणित होना चाहता है। इसीलिये मानव परंपरा में दिव्य मानवीयता वांछित व आवश्यक है। इस अवस्था में इच्छा बन्धन मुक्ति प्रमाण होना पाया जाता है। यही बन्धन मुक्ति का सार संक्षेप स्वरूप है। मुक्ति को आचरण में ही प्रमाणित होना पाया जाता है। व्यवहार कार्य में ही साक्षित होना पड़ता है। सम्पूर्ण अस्तित्व ही प्रकाशमान होने के कारण मानवीयता, देवमानवीयता, दिव्यमानवीयता भी प्रकाशित होना स्वाभाविक है। - आ.व. २०००, ११८-११९

मानव का सार्थक स्वरूप समाधान, समृद्घि, अभय और सह-अस्तित्व एवं उसकी निरंतर गति ही है। मानव परंपरा का नित्य गरिमा और महिमा स्वरूप अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था ही है। इन्हीं में भागीदारी प्रत्येक व्यक्ति में, से, के लिए दायित्व और कर्तव्य रूप में प्रमाणित होना पाया जाता है। यही प्रत्येक मानव वर्तमान में विश्वासपूर्वक जीने की कला है। - म.वि. 193–194

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