जीवों में प्रतिकूलता होते हुए भी समाधान के लिए शोध-अनुसन्धान करता हुआ देखने को नहीं मिलते। इस प्रमाण से पता लगता है जीव संसार सभी प्रतिकूलता और अनुकूलता को स्वास्थ्य के अर्थ में ही पहचानता है। इसी आधार पर जीव संसार को जीने की आशा के आधार पर जीवनी क्रम में जीता हुआ पहचाना गया है। हर जीवों में जीने की आशा का होना हर मानव को बोध होता ही है।
यद्यपि जीवों में जीवन, जीने की आशा को ही प्रमाणित कर पाया है। इसके मूल में यह भी पहचान में आया है कि शरीर को जीवन मानते हुए जीते हैं। इसलिए स्वस्थता के आधार पर अनुकूलता प्रतिकूलता को पहचाना करता है। यही जीव संसार का शरीर को जीवन मानने का प्रमाण है। मानव भी या तो जीवों के सदृश्य शरीर को जीवन मानते हुए अथवा नहीं मानते हुए जीता है। इससे पर्याप्त ज्ञान न होना स्पष्ट हो गया। हर मानव सुखी होना चाहता है सुखी होने का नित्य स्रोत समाधान है। समाधान ही सुख के रूप में अनुभूत होता है। इसका मतलब यह हुआ समाधान ही सुख है।
ऐसे समाधान के मूल में समझदारी का होना अनिवार्य है। समझदारी का फलन समाधान है, समाधान का फलन सुख है।
इस क्रम में हर नर-नारी के सुखी होने का स्त्रोत नित्य वर्तमान है समीचीन भी है।
समीचीनता का तात्पर्य है, हमारे प्रवृत्ति के आधार पर समाधान नित्य सुलभ है क्योंकि समझदारी को प्रमाणित करने का अरमान हर नर-नारी में समाहित है।
समझदारी के फल के अनुसार समझदारी का प्रमाण हो पाता है। समझदारी का स्वरूप अपने आप में सहअस्तित्व रूपी अस्तित्व दर्शन और जीवन ज्ञान का संयुक्त रूप है।
इस आधार पर मानव को जागृतिक्रम और जागृति रूप में आज की स्थिति में पहचानना बन गया है। जागृति मानव को स्वीकृत होना देखा जाता है। - ज.व. 78–82
मूलत: जीवन धर्म, सुख-शांति, संतोष-आनंद सहज प्रमाणों को जीवन क्रम से, नियम, न्याय, समाधान, सत्य ही हैं।
सम्पूर्ण अवधारणाएं मौलिकता के रूप में होना पाई जाती हैं। मौलिकताएं, धर्म और स्वभाव के ही सूत्र हैं। सम्पूर्ण अस्तित्व में, प्रत्येक एक, अपने “त्व’’ सहित व्यवस्था है, समग्र व्यवस्था में भागीदार है क्योंकि अस्तित्व में सम्पूर्ण इकाइयां (अथवा समस्त इकाइयां) सह-अस्तित्व सूत्र में सूत्रित हैं। - म.वि. 89