क्रिया का सम्पूर्ण स्वरूप, विभक्त प्रकृति के कार्य-कलापों के रूप में देखा जाता है। निर्णयों का स्वरूप प्रत्येक एक में प्रमाणित होने वाले नियंत्रण, संतुलन, पूरकता, विकास, परमाणु में, रचनाओं में उदात्तीकरण और रचना अर्थात् रासायनिक रचना; विकास और संक्रमण; संक्रमण और जीवनी-क्रम; जीवनी क्रम, जीवन जागृति क्रम, जागृति और जीने का कार्यक्रम; जीने का कार्यक्रम और व्यवस्था; व्यवस्था और समाज; व्यवस्था और जागृति; जागृति और संचेतना (जानना, मानना, पहचानना और निर्वाह करने का क्रिया कलाप) सहित; समाधान, समृद्घि, अभय एवं सह-अस्तित्व को प्रमाणित करने की शिक्षा परम्परा हो। इसके लिए आवश्यकीय सभी यंत्रों सहित प्रयोग परम्परा को पहचानने, निर्वाह करने के रूप में प्रमाणित करना है। इस प्रकार विज्ञान पद्घति, प्रयोजनों की पुष्टि है। - म.वि. 22–28

ज्ञान का तात्पर्य जानने-मानने-पहचानने-निर्वाह करने से है। विज्ञान का तात्पर्य तर्कसंगत विधि से ज्ञान को प्रवाहित करने का विचार है। तात्विक विधि से-कालवादी, क्रियावादी, निर्णयवादी (प्रमाणित और परिमाणित करने वाला) विचार विधि ही विज्ञान है। - अ.श. 163

विवेक सम्मत विज्ञान, विज्ञान सम्मत विवेक

यह पहले से विदित हो चुकी है कि विवेक का प्रयोजन लक्ष्य को पहचानने और निर्धारित करने में और विज्ञान का तात्पर्य दिशा निर्धारित करने पहचानने में होना पाया गया है। फलस्वरूप व्यवहार और कार्य इन दोनो में सहअस्तित्व प्रमाणित हो जाता है। सहअस्तित्व को प्रमाणित होने के क्रम में समाधान, समृद्घि, अभय, सहअस्तित्व प्रमाणित होता है। फलस्वरूप परिवारमूलक स्वराज्य विधि से हर नर-नारी अपने सौभाग्य को प्रमाणित कर देना सहज है।

विज्ञान विधि से काल के साथ क्रिया का, क्रिया के साथ काल को निर्धारित करने की एक सहज प्रणाली बन जाती है। क्योंकि विश्लेषण विधि से सम्पूर्ण प्रकार का वस्तु ज्ञान हुआ ही रहता है। वस्तु ज्ञान के साथ संयोजन ज्ञान हुआ रहता है। संयोजन ज्ञान के साथ परिणाम एवं प्रयोजन ज्ञान हुआ रहता है। इन सभी आधारों के साथ निर्णय होना सहज रहता है। इसकी औचित्यता को लक्ष्य के आधार पर परिशीलन करना विवेक विधि से सम्पन्न हो जाता है। विवेक विधि का उदय सहअस्तित्व ज्ञान से सम्पन्न हुआ रहता है। विवेक विधि से सहअस्तित्व का नजरिया सुस्पष्ट रहता है। सहअस्तित्व के नजरिया में समाधान, समृद्घि अभयता का स्वरूप समाया रहता है। अतएव इन लक्ष्यों के अर्थ में संश्लेषण होना एक स्वाभाविक क्रिया है। इसी के चलते लक्ष्य सम्मत दिशा निर्धारित हो जाती है। ऐसे निर्णयों के आधार पर योजना, कार्य योजना स्वीकार होती है। ऐसे स्वीकारने के आधार पर प्रतिबद्घता में निष्ठा होना पाया जाता है। इस विधि से हम जीकर प्रमाणित होने की स्थिति में पहुँचते हैं। इसकी आवश्यकता, जनसंवाद, परामर्श एक आवश्यकीय कार्यकलाप है। - ज.व. 100-101

Page 202 of 335