जैसा मानव अपने शक्ति को, बल को प्रभावित कर लोहे का परीक्षण करता है, तभी लोहे के प्रति विश्वास हो पाता है। इसमें मानव काफी सफल हो चुका है। बहुत सारी वस्तुओं के साथ परीक्षण-निरीक्षण किया जा चुका है। निश्चय को पाया गया है, इस निश्चयता के आधार पर अनेक प्रौद्योगिकी कार्यशील रहना देखा जा रहा है। इन्हीं में किसी प्रौद्योगिकी में भागीदारी करने की इच्छा से ही तकनीकी शिक्षा को हम आचरण करते हैं। इसमें सार्थकता भी दिखायी पड़ती है। इसका प्रमाण अनेक लोग प्रौद्योगिकी में भागीदारी करते हैं। प्रौद्योगिकी विधा में अनेक लोग सफल होते हुए भी मन:स्वस्थता में प्रमाणित होना अभी तक बना नहीं। मन:स्वस्थता के विधा में प्रमाणित होने के लिए मानव को पहचानना प्रधान हो जाता है। मानव को पहचाने बिना मन:स्वस्थता का प्रमाण होता नहीं है। मानव का पहचानना समाधान, समृद्घि पूर्वक जीता हुआ, न्याय को प्रमाणित करने से ही होता है। न्याय अपने में संबंध मूल्य, मूल्यांकन, उभय तृप्ति के रूप में स्पष्ट होना पाया जाता है।

स्वयं मानवीयता पूर्ण आचरण किये बिना दूसरे मानव में मानवीय आचरण को पहचानना बना ही नहीं। इसका प्रयोग इस प्रकार से किया जा सकता है। एक व्यक्ति जो मानवीय आचरण करता है, और दूसरा भी करता है, इनकी परस्परता में कार्य व्यवहार को आंकलित किया जाय और प्रयोग अनुसंधान को भी आंकलित किया जाय तो मानवीय आचरण का मूल्यांकन परस्परता में हो पाता है, मूल्यांकन परस्परता में ही होगा स्पष्ट हो जाता है। इसी क्रम में आगे एक व्यक्ति मानवीय आचरण करता है, दूसरा करता नहीं, उस स्थिति में करने वाले को स्वयं में विश्वास रहता है, न करने वाले को स्वयं में विश्वास रहता नहीं। तीसरी स्थिति यही है - दोनों मानवीय आचरण करते नहीं है, तब व्यसनों के संवाद में, व्यसनों में सहमत होने की बात आती है, आपराधिक कार्य, आपराधिक विचारों में कुछ-कुछ सहमत होने और असहमत होने वाली स्थिति आती है, इस प्रकार जाँचने से कोई निष्कर्ष निकलता नहीं है।

उक्त घटनाओं से हमें यह पता लगता है कि हर जागृत मानव अपने में व्यवस्था रूपी आचरण पूर्वक ही अपनी पहचान बनाये रखता है। यही यथास्थिति का निश्चयन है। यथास्थितियों का निश्चयन विधि से हम यह अध्ययन कर चुके हैं। पदार्थावस्था का निश्चयन, प्राणावस्था, जीवावस्था का निश्चयन विधियाँ विश्वास योग्य हो चुकी हैं। मानव अभी तक इन तीनों अवस्थाओं में विश्वास किया है, उसी के आधार पर अपने ढंग से सफलता भी पाया है। अपने ढंग का मतलब संग्रह सुविधा के अर्थ में सफलता को प्राप्त कर चुका है। भले ही सबको संग्रह सुविधा न मिला हो। इस प्रकार हम मानव अपने आवश्यकता को सुदृढ़ रूप में, परिपक्वता विधि से, प्रमाणित करने के क्रम में ही अखण्ड समाज तक पहुँचने की संभावना है। अखण्ड समाज सूत्र सार्थक होने के उपरान्त ही सार्वभौम व्यवस्था व्याख्यायित होता है। यही विज्ञान और विवेक का सार्थक कारगर स्वरूप होगी। इस क्रम में हमारे ध्यान देने का मुद्दा मानव, मानवत्व, मानवीयता पूर्ण आचरण, अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था सूत्र, व्याख्या का अध्ययन है। इन अध्ययन कार्यों में एक प्रधान मुद्दा यह है हर मानव का क्या प्रयोजन है। हर मानव का प्रयोजन यही है आचरण में सुदृढ़ता। इसके अनंतर प्रयोजन है, व्यवस्था में प्रमाण आचरण का। इसके बाद प्रयोजन की अंतिम ऊँचाई है सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी।

अभी मानव सबको पहचानते हुए मानव को पहचानने की विधा में सर्वाधिक पिछड़ा हुआ है। इसकी भरपायी ज्ञान विज्ञान विवेक पूर्ण कार्य व्यवहार से कर सकते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि तीनों अवस्था की इकाइयों में अपने त्व सहित व्यवस्था एवं समग्र व्यवस्था में भागीदारी प्रमाणित हो चुकी है। इसी के फलन में मानव मनाकार को साकार करने में सफल हुआ। लोहा अपने व्यवस्था में अचूक रहना, मिट्टी, पत्थर, मणि, धातु सब अपने-अपने आचरण में

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