''मानवीयता” व्यवहार में प्रमाणित होने का तात्पर्य यही है कि -
- हम जीवन ज्ञान में पारंगत रहेंगे। स्वयं के प्रति विश्वास करेंगे श्रेष्ठता के प्रति सम्मान करेंगे।
- अस्तित्व दर्शन में निर्भ्रम रहेंगे।
- स्वधन, स्वनारी/स्वपुरुष, दयापूर्ण कार्य-व्यवहार करेंगे।
- तन, मन, धन रूपी अर्थ का सदुपयोग एवं सुरक्षा करेंगे।
- संबंधों को पहचानेंगे, मूल्यों का निर्वाह करेंगे, मूल्यांकन करेंगे। – भ.व. 121
(इस ढंग से) मानवीयता पूर्ण आचरण परम आचरण है अथवा सम्यक आचरण है। यह आचरण मानवत्व का सूत्र और व्याख्या है क्योंकि अस्तित्व में प्रत्येक एक, अपने “त्व” सहित व्यवस्था है और समग्र व्यवस्था में भागीदार है। इस क्रमानुगत विधि से मानव, ‘’मानवत्व” सहित व्यवस्था है, यह प्रमाणित होता है।
मानवीयता का स्वरूप - मानवीय आचरण है जो मूल्य, चरित्र, नैतिकता के रूप में प्रमाणित होता है। कार्य रूप में स्वधन, स्वनारी/स्वपुरूष, दया पूर्ण कार्य व्यवहार के रूप में देखा जाता है। यह मानवीयता पूर्ण चरित्र के रूप में प्रमाणित होता है। मानवीयता पूर्ण आचरण में मूल्यों का स्वरूप जीवन मूल्य, मानव मूल्य, स्थापित मूल्यों की अनुभूति एवं शिष्ट मूल्यों की अभिव्यक्ति ही है ।
मानवीयता पूर्ण आचरण में नीति का स्वरूप तन, मन, धन रूपी अर्थ का सदुपयोग और सुरक्षा के रूप में नैतिकता प्रमाणित होता है। प्रत्येक मानव में, तन, मन, धन रूपी अर्थ, एक दूसरे के पूरक रूप में दिखाई पड़ते हैं। - म.वि. 28
मानव जागृति पूर्वक (अर्थात् जानने, मानने-पहचानने, निर्वाह करने के संगीत क्रम में) अस्तित्व में चार अवस्थाओं में से “त्व’’ सहित व्यवस्था को पहचानने के क्रम में है। जैसे पदार्थावस्था में-
- लोहत्व से लोहा, स्वर्णत्व से स्वर्ण, मणित्व से मणियां, मृदात्व से मिट्टी, पाषाणत्व से पाषाण (पत्थर) आदि को पहचाना जाता है। मानव मूल्यांकन करता है।
- दूबत्व से दूब, आमत्व से आम, नीमत्व से नीम, सालित्व से धान, बिल्वत्व से बेल, गोधोमत्व से गेंहू, आदि को प्राणावस्था में, उन उनके “त्व’’ सहित व्यवस्था से पहचाना जाता है। मौलिकताएं मूलत: मूल्य ही है।
- जीवावस्था में गौत्व से गाय, व्याघ्रत्व से व्याघ्र (शेर), मार्जारत्व से मार्जार (बिल्ली); श्वानत्व से श्वान, सर्पत्व से सर्प, मेषत्व से बकरी आदि जीवों को, उन उन के “त्व’’ सहित व्यवस्था कार्य में पहचाना जाता है।
ज्ञानावस्था में मानव अपने ‘त्व’ सहित व्यवस्था है। व्यवस्था में भागीदारी सहित “मानवत्व’’ का प्रमाण प्रस्तुत करना, अभी भी परम्परा रूप में साक्षित होने की प्रतीक्षा बनी हुई है। सम्पूर्ण मानवत्व का सूत्र नियम, न्याय, समाधान (धर्म) और सत्य ही है। नियम, प्राकृतिक, सामाजिक और बौद्घिक नियमों के रूप में अध्ययन गम्य है। न्याय के रूप में ही मानव - परम्परा में सम्बन्ध, मूल्य, मूल्यांकन की सामरस्यता के आधार पर, मानव प्रमाणित होता है।