• प्रधानत: कारणानुक्रम से अध्यात्म विज्ञान का, गुणानुक्रम न्याय (*विधि) से बौद्धिक विज्ञान का और गणितानुक्रम न्याय से भौतिक विज्ञान का अनुसंधान, आविष्कार और उपलब्धियाँ हैं।“ -व्य.द. १९७८, अध्याय १२”
  • "भौतिक विज्ञान, मनोविज्ञान, व्यवस्था विज्ञान और व्यवहार विज्ञान के मूल रूप में समाधान ही अक्षय स्रोत अक्षय त्राण और अक्षय प्राण है।“ भ.व. ८६
  • अध्यात्म विज्ञान - नित्य, सत्य, शुद्ध, बुद्ध सत्ता में अनुभूति योग्य क्षमता हेतु प्रयुक्त प्रक्रिया प्रणाली। -प.स. 8
  • ‘विवेक का तात्पर्य प्रयोजनों से है। विज्ञान का तात्पर्य विश्लेषणों से है। सामान्य रूप में मनुष्य प्रयोजन परिवार, समाज, व्यवस्था, शिक्षा, संस्कार, संविधान, संस्कृति, सभ्यता, जीव-वनस्पति, पदार्थ, ग्रह गोल, सह-अस्तित्व इन सबका प्रयोजन सम्मत विश्लेषण, विश्लेषण सम्मत प्रयोजनों को जानना- मानना विद्वता की अभिव्यक्ति है’ ।म.वि. 115

विज्ञान का तात्पर्य - कालवादी, क्रियावादी, निर्णयवादी ज्ञान से है।

“काल’’ का तात्पर्य क्रिया की अवधि से है। जिस क्रिया की अवधि से सारे काल को पहचाना जाता है, ऐसी क्रियाओं को भुलावा देकर, जब हम काल और काल विखंडन को पहचानने जाते हैं, तब भ्रमित होना, अवश्यंभावी है। काल के साथ क्रिया का, क्रिया के साथ काल का संतुलन ही विभक्त काल ज्ञान की सार्थकता है।

क्रियावादी ज्ञान, मूलत: इकाई में ऊर्जा संपन्नता बनाम (या) बल सम्पन्नता का साक्षात्कार करना है। प्रत्येक क्रिया के मूल में बल और शक्ति की अविभाज्यता दिखाई पड़ती है। शक्तियों का प्रकाशन, बल से संपन्न होने पर पाया जाता है। इस प्रकार बलों और शक्तियों की अविभाज्यता स्पष्ट है। बल और शक्ति की संपूर्णता के साथ ही प्रत्येक एक, वैभवित है। इसका मूल कारण अथवा मूल तथ्य सत्तामयता में सम्पूर्ण इकाइयों का संपृक्त रहना ही है। इस प्रकार क्रिया के मूल में विभक्त वस्तु और अविभक्त वस्तु (सत्ता) में सह-अस्तित्व ही, ऊर्जा सम्पन्नता की सहज, स्थिति, गति स्रोत है। अविभक्त वस्तु (सत्ता) ही, मूलत: ऊर्जा है, यह स्पष्ट किया जा चुका है। ऐसी नित्य सहज, पूर्ण और व्यापक ऊर्जा में, विभक्त रूप में संपृक्त अनंत प्रकृति, परमाणु अंशों से चलकर, महत् पिण्ड धरती, अनेक धरती ऊर्जा सम्पन्न रहती हैं। उन उन की क्रियाशीलता निरंतर, वर्तमान में प्रमाणित है ही। इसी के साथ साथ सम्पूर्ण प्रकृति, सत्ता में संतुलित - नियंत्रित रहती है, यह भी स्पष्टतया दिखाई पड़ता है। अस्तित्व में परमाणु अंशों के नियंत्रित रहने का साक्ष्य, परमाणु के रूप में गठित रहने के रूप में है। परमाणु संतुलित रहने का साक्ष्य, उसके निश्चित आचरण और अणु रचना के रूप में द्रष्टव्य है। अणुएं संतुलित रहने का साक्ष्य, भौतिक रचनाओं के रूप में द्रष्टव्य है। भौतिक रचनाएं संतुलित रहने का साक्ष्य रासायनिक क्रियाकलापों और रचनाओं के रूप में, द्रष्टव्य हैं।

रासायनिक द्रव्यों के संतुलन का साक्ष्य, जीवन जागृति तथा वंश परंपराओं में व्यक्त और साक्षित होने योग्य शरीर रचनाओं में स्पष्ट है। जीवन का संतुलन वंशानुषंगीय और जागृति विधि में प्रवर्तित और प्रमाणित होने के रूप में द्रष्टव्य है। इसी क्रम में मानव का संतुलन अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था सहज समाधान, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व पूर्ण पद्घति, नीति और प्रणालियों के रूप में समीचीन है।

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