संक्रमण, जागृति, प्रामाणिकता सहज सूत्रों से, पारंपरिक धाराओं से हटकर शोध करने का एक अवसर प्रदान करता है। - म.वि. 30–33
शिक्षा की विडम्बना यही है कि विज्ञान विधा से विशेषज्ञता प्रभावित है। विशेषज्ञता किसी विधा के किसी अंश में अपने को प्रतिष्ठित करने के प्रयत्नों में कार्यरत होना पाया जाता है। पुन: उसका अंश और उसके अंश के रूप में प्रयासों का उदय देखने को मिल रहा है। फलस्वरूप विशेषज्ञता प्रयोजन विहीन काला-दीवाल के सम्मुख सभी विधाओं में आ चुके हैं। जैसे - मात्रा विज्ञान अस्थिरता-अनिश्चयता के काला दीवाल के सम्मुख है। इसके विशेषज्ञ अपना मूल्यांकन कराने में निरीह देखा गया है। दूसरा वंशानुषंगीय विज्ञान यह मानव को अध्ययन कराने में विश्लेषित करने में सर्वथा असमर्थ होकर काला-दीवाल के सम्मुख होना देखा गया। तीसरा सापेक्षवाद अपने कल्पना को अज्ञात घटना के साथ वर्णित करने के रूप में विशेषज्ञों को देखा गया है। इन तीनों विधा के लिये अथवा इन विधाओं को पहचानने के लिये ऊर्जा की आवश्यकता को विज्ञान संसार में स्वीकारा गया है। यह अपने से गति ऊर्जा कहना आरम्भ करते हैं यथा चुम्बकीय धारा को विद्युत गति के रूप में परिणत करना इस गति को और गति विधा में चलकर तरंग का नाम लेते हैं। ऐसी तरंग वस्तु है या अवस्तु है इस तथ्य को उद्घाटित करने के लिये अभी भी प्रयोग करते जा रहे हैं। - आ.व. 50–51
विवेक की रोशनी में विज्ञान को मूल्यांकन करने की स्थिति में अभी तक जो भी विज्ञान का बरवान ?? है वह मानवता विरोधी होना पाया जाता है क्योंकि विज्ञान सूक्ष्मतम अध्ययन के पश्चात अस्तित्व में जो कुछ भी है पूर्णत: अनिश्चित, अस्थिर बताया जाता है। जबकि अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित विधि से विवेक पूर्वक परिशीलन करने पर पता चला है अस्तित्व स्थिर है विकास और जागृति निश्चित है। अतएव विज्ञान, विवेक सम्मत होने की आवश्यकता विधि में, व्यवहार प्रमाणों में प्रमाणित होना आवश्यक है।
सम्पूर्ण विज्ञान विधि से सकारात्मक पक्ष में दूर संचार उपलब्धि है। आहार, आवास, अलंकार सामग्रियों में संयोजन क्रियान्वयन कार्यकलाप में भी गति प्रमाणित हुई है। जैसे स्वचालित यंत्रों से उत्पादन। अतएव विज्ञान विवेक सम्मत होने की स्थिति में सम्पूर्ण दूरसंचार मानवीयता के पोषण संरक्षण में होना पाया जाता है। सर्व मानव में मानवीयता स्वीकार है। - म.वि. 206
(B) सहअस्तित्ववादी विज्ञान का दृष्टि
सभी वस्तुयें अपने सूक्ष्म रूप में, परमाणु के रूप में मूल मात्रा है। रचना के रूप में बड़े-छोटे इकाइयों के रूप में हमें उपलब्ध हैं, खनिज के रूप में उपलब्ध हैं। इन उपलब्धि के साथ हमारे भविष्य की डोरी बंधी रहती है। आज हमने जो कुछ भी आचरण किया, कार्य-व्यवहार किया, अव्यवस्था में आचरण किया, इसका फल परिणाम आज न हो, वर्षों में भी हो, हमें भोगना ही पड़ेगा। इस प्रयत्न से यह भी समझ में आता है कि वर्तमान में हमें सदा-सदा के लिए समझदार होना ही है। समझदार रहने के लिए आवश्यक है कि समझदारी परंपरा को बनाये रखने के लिए प्रयत्नशील भी रहना है। यही मानव की स्थिति-गति का मतलब है।