होना भी प्रतिपादित हो चुकी है। समझदारी का मूल वस्तु सहअस्तित्व दर्शन ज्ञान, जीवन ज्ञान ही है। इस ढंग से संज्ञानशीलता के आधार पर समझना हम पहचान चुके हैं। इसलिए संज्ञानशीलता अपने में संवेदनाओं को पुष्ट करते हुए नियंत्रित रखना बन जाता है। इस विधि से यह सिद्घान्त स्पष्ट होता है कि संज्ञानशीलता पूर्वक ही संवेदनाएँ नियंत्रित होती हैं। संज्ञानशीलता पूर्वक संवेदनाएँ नियंत्रित रहती हैं इस तथ्य की पुष्टि सम्बंधो को पहचानने, निर्वाह करने के रूप में पहचानते हैं। परस्पर मूल्यांकन पूर्वक उभयतृप्ति के रूप में पहचानते हैं। सम्बंध, मूल्य, मूल्यांकन, उभय तृप्ति पूर्वक संवेदनाओ में नियंत्रण पाते हैं। फलस्वरूप स्वधन, स्वनारी/स्वपुरूष, दया पूर्ण कार्य व्यवहार पूर्वक नियंत्रण को पहचानते हैं।

  • तन, मन, धन रूपी अर्थ का सदुपयोग, सुरक्षा पूर्वक संवेदनशीलता के नियंत्रण को पहचानते हैं।
  • समाधान, समृद्घिपूर्वक जीने के क्रम में नियंत्रण समझ में आता है।
  • वर्तमान में विश्वास, सहअस्तित्व प्रमाण विधि से संवेदनाएँ नियंत्रित होना पायी जाती हैं।
  • अखंड समाज विधि से संवेदनाएँ नियंत्रित होना पायी जाती हैं।
  • सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी करने के रूप में संवेदनाओं का नियंत्रित होना पाया जाता है।
  • परिवार व्यवस्था में भागीदारी करते हुए संवेदनाओं का नियमित होना पाते हैं।

इस विधि से जागृत परम्परा को प्रमाणित करना बन जाता है।

व्यवहार मानव की स्वयं स्फूर्त प्रवृत्ति है। जीव संसार की प्रवृत्ति कार्य है। सभी जीव वंशानुषंगी विधि से कार्य प्रवृत्ति में हैं। इसे हर व्यक्ति परीक्षण कर सकता है। क्योंकि गाय की संतान गाय जैसे कार्यों में प्रवृत रहती है। इसकी संवेदनशीलता सीमा है। संवेदनशीलता पूर्वक ही जीव संसार का वैभव निश्चित होता है। वैभव निश्चित होने का तात्पर्य आचरण निश्चित होने से है।

हर जीवों की संवेदनशील प्रक्रियाएँ निश्चित रहना ही आचरण का निश्चय है। सुनिश्चित आचरण के आधार पर ही हर मानव समस्त प्रकार के जीवों को पहचानता है। वनस्पति संसार बीज गुणानुषंगी पहचान है। इसका आचरण गुणों को प्रमाणित करने के अर्थ में निश्चित होना पाया जाता है।

मानव संस्करानुषंगी है। संस्कार ही अवधारणा, समझ के रूप में पाया जाता है। जागृत मानव सहज रूप में समझदारी के आधार पर ही सम्पूर्ण प्रकार के विचार करता हुआ, विचारों के आधार पर अथवा विचार शैली के आधार पर ही जीने की कला अथवा जीवन शैली ही सम्पूर्ण कार्यकलाप होना पाया जाता है। मूल समझ का स्वरूप अस्तित्व रूपी सह-अस्तित्व ही होना स्पष्ट हो चुका है। - स.श. 260

परिभाषा

  • व्यवहार

मनुष्य की परस्परता में निहित मूल्यों का निर्वाह।

Page 207 of 335