• एक से अधिक एकत्रित होने पर या होने के लिए किया गया आदान- प्रदान। स्थापित सम्बन्धों में निहित स्थापित मूल्यों के अनुभव सहित शिष्टतापूर्ण पद्धति से व्यवसाय मूल्य का उत्पादन, उपयोग, उपभोग एवं वितरण।
  • सम्बन्ध
  • जिस परस्परता में, प्रत्याशाएँ दायित्व एवं कर्त्तव्य पूर्वनिर्धारित हों ऐसे मिलन की संबंध संज्ञा है।
  • पूर्णता के अर्थ में सहअस्तित्व सहज अनुबंध।
  • दायित्व सहज स्वीकृति, वहन, कर्तव्य निर्वाह।
  • संपर्क
  • जिस परस्परता में प्रत्याशाएँ ऐच्छिक रूप में निहित है, ऐसे मिलन की संपर्क संज्ञा है।
  • सामाजिकता
  • सम्पूर्ण संपर्कों एवं संबंधों का निर्वाह
  • व्यावहारिकता
  • अर्थ (*तन मन धन) का सदुपयोग सुरक्षा
  • सार्वभौम/समाज व्यवस्था में भागीदारी
  • संस्कृति, सभ्यता में भागीदारी
  • परिवार सहज उत्पादन, न्याय, विनिमय में भागीदारी, शिक्षा, स्वास्थ्य में भागीदारी -( प.स.; व्य.द.)

5.4 परिवार में दाम्पत्य सम्बन्ध

मानव ही जागृत व जागृति पूर्ण होता है, हो सकता है, होने के लिये इच्छुक है। इस कारण पहचानना निर्वाह करना और जानना-मानना सहज है। इसी क्रम में पति-पत्नी सम्बन्ध भी सहज है। इस सम्बन्ध में शरीर, (अथवा तन) सम्बन्ध, अन्य सम्बन्धों से भिन्नता का आधार है। शरीर सम्बन्ध मानव संतानार्थ सार्थक है। यही व्यसन के रूप में अथवा कामोन्माद के रूप में परिवार के असंतुलन तथा अव्यवस्था के रूप में परिणित होता है।

परिवार मूलक विधि से ही, स्वराज्य व्यवस्था नैसर्गिक है। व्यवस्था प्रत्येक मनुष्य का अभीष्ट है। इस प्रकार मानव परिवार के ध्रुव के रूप में पति-पत्नी का सम्बन्ध, पहचान व निर्वाह सहज है।

पति-पत्नी का मानस, परिवार के आकार में, सुदृढ़ होना ही एक मन, दो शरीर का तात्पर्य है। साथ ही जीवन जागृति का संकल्प होना, एक मन दो शरीर का तात्पर्य है। जीवन जागृति प्रत्येक मनुष्य की अभीप्सा है। जीवन जागृति, जीवन-विद्या बोध होने के उपरान्त है। यह जीवन क्रिया कलापों के अंतर्सम्बन्ध को, परस्पर जीवन प्रभाव क्षेत्र अनुबन्ध क्रम से स्पष्ट करता है। निरीक्षण, परीक्षण विधिपूर्वक अभ्यास से, दृष्टा पद प्रतिष्ठा सहज ही प्रमाणित होता

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