व्यक्ति में परस्पर और आगंतुक रूप में आये हुए लोगों के साथ जो समाधान समृद्धि का भरोसा सदा-सदा प्रमाणित होना ही परिवार संतुलन है।
ऐसे परिवार संतुलन के साथ ही नैसर्गिक संतुलन की योजना कार्य समाहित रहता है और समझदार सभी मानव परिवार के साथ सम्बंध निर्वाह लक्ष्य के संदर्भ में हो पाता है। इस धरती के सभी परिवार समझदार होने की स्थिति में विश्व मानव परिवार होने की संज्ञा पाते हैं। परस्पर हर परिवार एक दूसरे के पूरक होना सार्थकता के अर्थ में मूल्यांकित होता है। मानव सहज सार्थकता अथवा सार्वभौम लक्ष्य, समाधान, समृद्धि, अभय, सह-अस्तित्व ही है अतएव सम्पूर्ण कार्य योजना, विचार विधि, उसके मूल में समझदारी, ये सब एक दूसरे के पूरक और संतुलनकारी होना पाया जाता है। - म.वि. 163
5.6 जागृति पूर्वक ही परिवार संतुलित है
मन, मान्यताओं के आधार पर कार्यशील रहता है। मान्यताएं, शरीर व्यापार के साथ होना, ही भ्रम का कारण है। यह शरीर का अधिमूल्यन है, जीवन का अवमूल्यन है। भ्रमित मानसिकता में की जाने वाली सभी क्रियाएं, सर्वथा अव्यावहारिक होती हैं। मनुष्य सभी आयामों, दिशा, कोण, परिप्रेक्ष्य में व्यक्त होता है। निर्भ्रम अवस्था, जागृत अवस्था में मनुष्य, जितनी भी विद्याओं में, कार्य-कलापों को सम्पन्न करेगा, वह सब न्यायिक, समाधानित, प्रामाणिकता सम्पन्न रहता ही है। निर्भ्रम आधार पर मानव, समाधान, न्याय, समृद्घि, तथा सह-अस्तित्व सम्पन्न होता है। उत्थान की ओर गतिशीलता के अर्थ में, उल्लास उत्सव के रूप में बना रहता है। उसके आधार पर मनुष्य का सम्पूर्ण लक्ष्य, सफल होता है। मानवीयता पूर्ण मनुष्य का लक्षण, न्यूनतम रूप में, परिवार में प्रमाणित होता है सम्पूर्ण समग्र व्यवस्था में भागीदारी के रूप में प्रमाणित होता है क्योंकि परिवार ही मानव समाज और व्यवस्था का न्यूनतम ध्रुव है तथा समग्र व्यवस्था ही अधिकतम ध्रुव है। परिवार, समाज अखंड है और व्यवस्था सार्वभौम है। परिवार अखंड होने के आधार पर ही, विश्व परिवार के रूप में समाज और उसकी अखंडता प्रमाणित होती है।
परिवार की अखंडता ही, विश्व परिवार की अखंडता का आधार है। परिवार में अन्तर्विरोध ही परिवार विघटन है। यह भ्रमवश व्यक्तिवादी प्रवृत्ति के कारण होना पाया जाता है। परिणामत: अखण्ड समाज का कल्पना ही नहीं हो पाती है। सभी छोटा परिवार, सयुंक्त परिवार दोनों ही व्यक्तिवादवश वाद-विवाद में रह गये हैं। भोग लिप्सा, व्यसन के लिये छोटे परिवार को अनुकूल माना गया है। परिवार खंडित होने के उपरान्त, परिवार नहीं रह पाता है। अकेले एक मनुष्य के आधार पर, परिवार का प्रमाण नहीं हो पाता। इसी प्रकार विघटित मानव, समाज के रूप में नहीं होता। परिवार व समाज का विघटन, मानव कुल का अभिशाप है। इससे मुक्त होने के लिए, मानव की मानवता ही एक मात्र विधि है। म.वि. (१९९८) १५९-१६०
मानव व्यवहार, कर्म, अभ्यास एवं अनुभव परम्परा में ही, मनुष्य के उत्साहित रहने से, हँसी खुशी के साथ, नित्य सफलता समीचीन रहती है। भ्रमवश ही विघटित परिवार और समाज, आवेशों अवमूल्यन को उत्साह मानता और साथ ही अवमूल्यन कार्यों को मानता है। यह भय व प्रलोभन का रूप है। भय-प्रलोभन मनुष्य का भ्रमवश लिया गया निर्णय है। यह मानव कुल के लिए अव्यावहारिकता का कारण हुआ। अन्य अव्यावहारिकताएं, द्रोह-विद्रोह, शोषण,