है। दृष्टा पद प्रतिष्ठा को प्रमाणित करना ही यतीत्व व सतीत्व का तात्पर्य है। एक पत्नी व्रत, एक पतिव्रत भी, यतीत्व और सतीत्व का प्रमाण है। इस प्रकार स्वानुशासन के रूप में दृष्टा पद का, जीवन-जागृति का प्रमाण, मानव सहज है।
इस धरती में ही चारों अवस्थाओं का वैभव वर्तमान है। इस धरती पर मानव संतान संख्या का नियंत्रण होना, पति-पत्नी का एकत्र निश्चय मानसिकता होना, मानव अखंड समाज के रूप में स्पष्ट होना, परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था सार्थक होना आवश्यक है। ये सब एक दूसरे के पूरक हैं। इस प्रकार दाम्पत्य में, उभय मानसिकता-निर्णयों में, एक रूप होने से सहज ही, सर्वशुभ समीचीन होता है। इसका आधार मानवीयता है। जिसका प्रमाण स्वयं के प्रति विश्वास और श्रेष्ठता के प्रति सम्मान करने योग्य होना है। - म.वि. 102-103
मानवीयतापूर्ण मानव परंपरा में मानव कुल के रूप में शरीर निर्माण गर्भाशय में होने एवं उसका पोषण-सरंक्षण-संवर्धन एक आवश्यकीय भूमिका है। इस कार्य को सम्पन्न करने के लिए ही विवाह सम्बन्ध का सर्वोपरि प्रयोजन है। इसी के साथ-साथ यौवन और यौन विचार संयोग की आपूर्ति स्वाभाविक रूप में होना पाया जाता है। इसमें यह भी देखा गया है मानवीयतापूर्ण मानसिकता, विचार, चिन्तन (मानवीयता के प्रति दायित्व-कर्तव्य मानसिकता की सुदृढ़ता) समुन्नत और परिष्कृत होते-होते यौन-यौवन संबंधी आकर्षण अथवा सम्मोहन क्षय होता है। यह भी मानवीयता के प्रति निष्ठान्वित हर नर-नारी में परीक्षण और सत्यापन संगीत का पाया जाना नैसर्गिक है। - स.श. 154
धीरता-वीरता पूर्वक ही परिवार संतुलन, परिवार संतुलन को ही परिवार में भागीदारी करने वाले सभी मानव सम्मिलित रहते हैं। ये सभी समझदार हैं अथवा होना चाहते हैं। ऐसी स्थिति में परिवार संतुलन सहज रूप में प्रमाणित होता है। हर समझदार मानव सम्बंधों को पहचानता ही है जैसे माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नि। यह तीन सम्बंध स्पष्ट रहता ही है। माता-पिता का भी माता-पिता होना वांछित संभावित रहता ही है। उनका भी भाई-बहन होना स्वाभाविक है इस प्रकार वंशानुक्रम में अर्थात् संतान के अनन्तर पुनः संतान क्रम में ये सब सम्बंध स्पष्ट रहता ही है। इन्हीं को हम दादा-दादी चाचा-चाची आदि नामों से संबोधित किया करते हैं। इनमें प्रयोजनों को समझना ही समझदारी है, फलस्वरूप परिवार संतुलन होना सहज है। परिवार में ही न्याय का अपेक्षा बनी रहती है। यह अपेक्षाएं पूरा होने के मूल में सम्बंधों को प्रयोजन के मूल में पहचान लेना उन सम्बंधों में निहित मूल्यों को निर्वाह करना है।
माता-पिता के साथ सम्बंध निर्वाह परिवार का उद्देश्य समाधान समृद्धि के रूप में पहचान लिए रहते हैं। परस्पर व्यवहार में हर पुत्र-पुत्री सम्मान कृतज्ञता पूर्वक विश्वास निर्वाह करना बन पाता है। जबकि परस्पर परिवार के उद्देश्य के लिए कार्यकलाप बना रहता है और व्यवहार बना रहता है। व्यवहार की अभिव्यक्ति हर जागृत मानव में तन-मन-धन का अर्पण-समपर्ण सहित उत्पादन के लिए नियोजन कार्य सहित निर्वाह होना पाया जाता है। फलस्वरूप परिवार सहज समाधान समृद्धि निरंतर प्रमाणित होना स्पष्ट हो जाता है। इसी प्रकार भाई-बहन के परस्परता में भी परिवार सहज उद्देश्य ही प्रधान रहता है इसमें भागीदारी करना ही परिवार संतुलन का प्रमाण है। परिवार में भागीदारी करने वाले हर