युद्घ में देखने को मिलती हैं। यह मानव कुल में आवेश का साक्ष्य है। जबकि समाधान, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व सर्वमानव का स्वत्व एवं स्वभाव गति है। इसकी संभावनाएं, यथार्थता के आधार पर स्पष्ट होती हैं। - म.वि. 70–71
सम्बन्ध व मूल्यों में, जीवन जागृति का लक्ष्य समाया रहता है। सदुपयोगिता का आधार मापदण्ड यही है कि परिवार मानव (अथवा मानव परिवार) तन, मन, धन रूपी अर्थ को सम्बंधों में अर्पित-समर्पित कर, प्रसन्नता और समाधान का अनुभव करता है। प्रसन्नता और समाधान का प्रमाण प्रस्तुत करता है। प्रयोजनीयता का प्रमाण, जीवन जागृति सहज, स्वानुशासन है। समझदारी का प्रमाण, मानवीय कर्तव्यों व दायित्वों का निर्वाह करना ही है। यही उपयोगिता एवं सदुपयोगिता का प्रमाण है। मानवीयता का मार्गदर्शक, अतिमानव रूपी देव मानव व दिव्य मानव ही है। यही प्रयोजन है। - म.वि. 132
मानवीयता पूर्ण जीवन का कार्यक्रम ही जीवन में स्थिरता, न्याय प्रदायी क्षमता और अधिक उत्पादन कम उपभोग योग्य योग्यता का उपार्जन है। अमानवीयता पूर्ण जीवन में न्याय प्रदायी क्षमता का निर्माण होना संभव नहीं है। न्याय प्रदायी क्षमता के बिना समाज संरचना एवं सामाजिकता का निर्वाह सिद्ध नहीं होता। सामाजिकता के बिना मानव सफल नहीं है। - अ.द. 111
लाभालाभ, हिताहित एवं प्रियाप्रिय दृष्टि से तथा लाभ, हित एवं प्रिय सीमावर्ती प्रवृत्ति पूर्वक सामाजिकता का होना प्रमाण सिद्ध नहीं है। मानव चेतना सहज सामाजिकता ही समाज को गठित करती है। सामाजिकता ही न्यायान्याय, धर्माधर्म एवं सत्यासत्य पूर्ण दृष्टि से न्याय, धर्म, सत्य पूर्ण व्यवहार, विचार एवं अनुभूति है। प्रिय, हित, लाभ प्रवृत्तियों का न्याय सम्मत होना ही संयमता है। प्रिय, हित एवं लाभ की सीमा में वैविध्यता का अभाव नहीं है। यही तथ्य जीवन में अंतर्विरोध एवं परस्पर विरोध का मूल कारण है। - अ.द.142
प्रिय- हित-लाभ सीमान्तवर्ती दृष्टि से किया गया निर्णय एवं क्रियाकलाप अंतर्विरोध से मुक्त नहीं है। इन सबका न्याय सम्मत होना ही अंतर्विरोध से मुक्ति है। न्याय सम्मति तब तक संभव नहीं है जब तक स्थापित मूल्यानुभूति एवं उसका निर्वहन न हो जाय। न्याय ही व्यवहार में मध्यस्थता है। मध्यस्थता ही सम और विषम अर्थात् समातिरेक और विषमातिरेक को संतुलित एवं आत्मसात् करता है। सम-विषम दोनों मध्यस्थता में आश्रित एवं संरक्षित हैं। यही सत्यता मध्यस्थता एवं मध्यस्थ जीवन की प्रतिष्ठा, महत्ता एवं अपरिहार्यता को स्पष्ट करती है। आचरण एवं व्यवहार में मध्यस्थता ही बहिर्विरोध अर्थात् पाँचों स्थितियों में विरोध का शमन करता है। विचार में मध्यस्थता चारों आयामों के अंतर्विरोध का उन्मूलन करती है। - अ.द. 115
5.7 सम्पूर्ण मानव परिवार ही समाज का स्वरूप है
सभी सम्बन्ध परिवार के ध्रुव हैं। परिवार में एक से अधिक व्यक्तियों का विश्वास पूर्ण सम्मिलित उत्पादन कार्य करना तथा सम्बन्धों की पहचान, मूल्यों का निर्वाह रूपी व्यवहार करना सुलभ होता है। प्रत्येक सम्बन्ध निश्चित ध्रुव है।