भूचरों के रूप में देखने को मिलते हैं। ऐसे अण्डज संसार पिण्डज संसार को जोड़ता है। पिण्डज संसार अपने में अण्डज संसार से विकसित रचना है। अण्डज, पिण्डज संसार के उपरांत रासायनिक द्रव्यों का विश्लेषण-संश्लेषण सप्त धातुओं के रूप में होता हुआ मनुष्य शरीर रचना तक सुस्पष्ट हुआ है। - क.द. 67

अण्डज-पिण्डज संसार रचना क्रम में शरीर रचना के लिये आवश्यकीय सभी रासायनिक द्रव्य और भौतिक वस्तुएं सहज सुलभ होने के क्रम में, मेधस रचना क्रम शरीर रचना क्रम के साथ आरम्भ होकर समृद्ध होना विकास क्रम में स्वाभाविक कार्य प्रणाली रही है। यह अण्डज-पिण्डज दोनों प्रकार के जीवावस्था का वैभव वंशानुषंगीयता को प्रमाणित अथवा व्यक्त करता हुआ देखने को मिलता है।- स.श. 39

इन सारे रचनाओं का क्रम और मनुष्य शरीर के अध्ययन से यही पता लगता है कि मनुष्य शरीर में मेधस रचना की समृद्घि पूर्णतया सुस्पष्ट हुई है। इसका प्रमाण यही है कि मानव में कल्पना-शीलता, कर्मस्वतंत्रता और उसकी तृप्ति के रूप में जानने, मानने, पहचानने, निर्वाह करने को मेधस के माध्यम से व्यक्त करने योग्य इकाई है। मनुष्येतर संसार पहचानना, निर्वाह करने तक सीमित है। पहचानना, निर्वाह करने का आधार भी बल संपन्नता ही है। यही ऊर्जा संपन्नता, बल संपन्नता जीवंत स्वस्थ मानव में जानने, मानने, पहचानने, निर्वाह करने के रूप में प्रमाणित हो चुकी है। यह मेधसतंत्र समृद्घ होने की गवाही भी है। उक्त विधि से रचनाओं में विकास होने की रूप रेखा विदित होती है।

भौतिक रासायनिक रचना-विरचना

सह-अस्तित्व सहज इस धरती पर चार अवस्थाओं में जैसे - पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था और ज्ञानावस्था में, प्रकृति का वैभव देखने को मिलता है। यही प्राणपद, भ्रांतिपद, देवपद और दिव्यपद में वैभवित रहना अध्ययन गम्य है। जैसे - पदार्थावस्था का आंशिक तत्व प्राणावस्था में, प्राणावस्था का अधिकांश तत्व पदार्थावस्था में परिवर्तित होता हुआ देखने को मिलता है। इसी को दूसरी विधि से कह सकते हैं कि, अन्न वनस्पति रूपी प्राणावस्था का वैभव, रासायनिक द्रव्यों की महिमा के रूप में वैभवित हुई है। सभी अन्न वनस्पतियां, रासायनिक भौतिक रचना के रूप में पाई जाती हैं। इसका मूल तत्व भौतिक वस्तुएं हैं। भौतिक वस्तुओं का रूप अणुएं हैं, अणुओं का स्वरूप है। अणुओं के मूल रूप में परमाणु ही है। परमाणुओं के मूल रूप में परमाणु अंश ही भौतिक वस्तुओं के रूप में दिखाई देते हैं। इस प्रकार भौतिक वस्तुएं रासायनिक द्रव्यों के रूप में, रासायनिक द्रव्य प्राण कोषा और कोषाओं से रचित, रचनाओं के रूप में होती हैं।

प्राण कोषाओं से रचित सम्पूर्ण रचनाएं विरचना क्रम में पदार्थावस्था में परिवर्तित होते देखी जाती हैं। यही आवर्तनशीलता का प्रथम प्रमाण, पूरकता के साक्ष्य के रूप में देखने को मिलता है। मनुष्य शरीर और जीव शरीर भी प्राण कोशाओं से रचित है। इसकी विरचना भी, अन्न वनस्पतियों की विरचना की तरह, पदार्थावस्था में परिवर्तित होने के क्रियाकलाप के सदृश दिखाई पड़ती है। इसी के साथ पदार्थावस्था और प्राणावस्था की तरह स्वेदज प्रकृति का भी, इसी प्रकार परिणितियों से संपन्न रहना, देखा जाता है।

स्वेदज संसार भौतिक वस्तु और रासायनिक द्रव्य सहज, संयोग होता है। इनका आचरण न तो भौतिक वस्तुओं जैसा होता है, और न समृद्घ मेधस सम्पन्न शरीर रचना और जीवन के संयुक्त रूप में होने वाले आचरण जैसा। इसीलिए

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