(C) परमाणु में विकास (चैतन्य जीवन)
इससे पहले रचनाओं में विकासक्रम स्पष्ट हुआ है। यह विकासक्रम परमाणु, अणु, अणुरचित पिण्ड, वनस्पति संसार, पशु-शरीर, मनुष्य-शरीर की रचना तक, रचना में विकास क्रम को स्पष्ट किये हैं। मनुष्य शरीर सर्वोच्च विकसित रचना के रूप में अध्ययन गम्य है।
मनुष्य शरीर सर्वोच्च विकसित रचना इसलिये है कि मनुष्य शरीर में मेधस रचना पूर्णतया विकसित हो चुकी है। सुदूर विगत से ही मानव न्याय, धर्म, सत्य संबधी तथ्यों को उद्घाटित करने का इच्छुक रहा है। इस क्रम में जितने भी प्रयोग हुए हैं और आगे भी सूझ-बूझ को विकसित करने की आवश्यकता बनी रही। प्रयासों के क्रम में आदर्शवादी, भौतिकवादी सूझबूझ प्रयोग में आई। फल-परिणाम मानव कुल में आंकलित हो चुका है।
न्याय की अपेक्षा आज भी सर्वाधिक मानव में बनी हुई है।
उक्त क्रम में अस्तित्व को सहअस्तित्व के रूप में समझने के लिए, अभिव्यक्त करने के लिए प्रयास प्रस्तुत है। अस्तित्व स्वयं सहअस्तित्व होने के आधार पर रचनाओं में विकासक्रम स्पष्ट हुआ। हर रचना के मूल में परमाणु होना स्पष्ट है। परमाणुओं में विकासक्रम होना, विकास होना भी समझ में आता है।
परमाणु में विकास का तात्पर्य परमाणु के गठनपूर्ण होने से है। - क.द. 67
परिणाम के अमरत्व के रूप में गठनपूर्णता (जीवन परमाणु) है।
प्रत्येक परमाणु क्रिया अपने परमाणु अंशों के गतिपथ सहित वैभवित है। यही गतिपथ उस परमाणु की नियन्त्रण रेखा भी है और सीमा भी है। ऐसे गतिपथ की सीमा में प्रत्येक परमाणु अपने में समाहित सम्पूर्ण परमाणु अंशों के अनुशासन समेत परिभाषित होता है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि प्रत्येक परमाणु में समाहित प्रत्येक परमाणु अंश अपनी परस्परता में एक निश्चित दूरी में अपने अस्तित्व को स्पष्ट करते हुए अनुशासन को, गठन के अंगभूत कार्य के रूप में प्रकाशित करते हैं। ऐसे प्रत्येक परमाणु में अंशों का घटना बढ़ना देखा जाता है।
इस क्रिया को किसी एक परमाणु से कुछ परमाणु अंशों का क्षरण होना तथा दूसरे किसी परमाणु में समा जाना या अन्य परमाणु में गठित हो जाने के रूप में देखा जाता है। इसी क्रम में गठनपूर्णता गण्य है। इसका साक्ष्य अक्षय बल एवं अक्षय शक्ति संपन्नता से होता है। चैतन्य-प्रकृति में अक्षय बल एवं अक्षय शक्ति स्पष्ट है। यही तात्विक परिणाम प्रक्रिया है। इसी क्रम में विभिन्न संख्यात्मक अंश संपन्न परमाणु अस्तित्व में दिखाई पड़ते हैं। ऐसे विभिन्न परमाणु अंशों की संख्या से संपन्न परमाणु स्वयं विभिन्न जातियों में गण्य होते हैं। यही तात्विक परिवर्तन, स्थिति, अभिव्यक्ति, प्रकाशन और ज्ञान का तात्पर्य है। - भ.व. 49,51
इसके पहले यह भी स्पष्ट किया जा चुका है कि परमाणु में ही विकास होता है। ऐसे विकसित परमाणु गठनपूर्ण होते हैं, यही चैतन्य इकाई है, यही जीवन है। जीवन ही शरीर को जीवंत बनाये रखते हुए समझदारी को प्रमाणित करता है। मानव में एक बात की चाहत बनी ही है - यथास्थिति, वैभव, उसकी निरंतरता - यह स्वाभाविक रूप में स्वीकृत है। परमाणुओं में अंशों का घटना-बढ़ना, परिणाम के स्वरूप में हम समझ चुके हैं। परिणाम का अमरत्व, उसकी निरंतरता